ग्लोबल वार्मिंग के कारण मौसम का मिजाज बदलने से हिम रेखा पीछे खिसकती जा रही है, जिससे हिमालयी क्षेत्र में बर्फ क्षेत्र घट रहा है।
बर्फबारी न होने से 'घट' रहा हिमालय
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हिम रेखा पीछे खिसकने से ग्लेशियर सिकुड़ रहा है
जलवायु परिवर्तन का यह प्रभाव मध्य हिमालयी क्षेत्र के बर्फ से ढके रहने वाले इलाके पर पड़ रहा है। गंगोत्री का भोजवासा क्षेत्र जो कभी बर्फ से ढंका लकदक रहता था, वहां वनस्पतियां उग आई हैं। गंगोत्री ग्लेशियर पहले जहां तक फैला हुआ था, वहां हिम रेखा पीछे खिसकने से ग्लेशियर सिकुड़ रहा है।
विज्ञानियों का कहना है कि वनस्पतियां उग आने से यहां बर्फ गिरी भी तो इकट्ठी नहीं हो पाती है। वनस्पतियों की वजह से माहौल बदल जाता है। इसी तरह पूरे हिमालयी क्षेत्र में विज्ञानियों ने ट्री लाइन ऊपर जाने और स्नो लाइन पीछे खिसकने की पुष्टि की है।
विज्ञानियों का कहना है कि ऊपर (हाई एल्टीट्यूड) पर बर्फ चाहे जितनी गिरे, जब तक यह नीचे की ओर नहीं आएगी ग्लेशियरों की सेहत में सुधार नहीं होगा।
हिम रेखा के और सिकुड़ने का अंदेशा पैदा
दिसंबर-जनवरी में अभी तक गंगोत्री क्षेत्र में सिर्फ 80 सेमी बर्फबारी हुई है। इस क्षेत्र में गढ़वाल हिमालय का सबसे बड़ा ग्लेशियर है। वर्ष 2002 में इस क्षेत्र में इन दिनों 20 फुट बर्फ गिरी थी।
वर्ष 2016 के अलनीनो वर्ष होने पर यहां बर्फबारी न के बराबर हुई। लेकिन वर्ष 2017 में अभी तक यहां बहुत सुधार नहीं दिख रहा है। इस वजह से हिम रेखा के और सिकुड़ने का अंदेशा पैदा हो गया है। यही स्थिति कमोबेश पूरे मध्य हिमालयी क्षेत्र में नजर आ रही है।
स्नो लाइन के ऊपर जाने से बर्फ का क्षेत्र कम होता जाएगा। यहां वनस्पतियां उग आएंगी। इससे बर्फ इकट्ठी नहीं हो पाएगी। इससे ग्लेशियरों की सेहत और खराब हो सकती है। दिसंबर-जनवरी में अभी तक ढंग की बर्फबारी न होना अच्छे संकेत नहीं हैं।
- डा. समीर तिवारी, गंगोत्री प्रभारी एवं विज्ञानी, हिमनद अध्ययन केंद्र, वाडिया हिमालय भू विज्ञान संस्थान