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इस त्योहार को बंद कराते ही अंधा हो गया था ब्रिटिश कमिश्नर, फिर बदला अपना निर्णय

Wed, 09 Aug 2017 10:17 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला,चंपावत
ब्यूरो/अमर उजाला,चंपावत Updated Wed, 09 Aug 2017 10:17 AM IST
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bagwal is very famous festival for uttarakhand citizens
bagwal festival

अंग्रेजी हुकूमत के समय ब्रिटिश कमिश्नर ने इस त्योहार को बंद करने का आदेश दिया था। जिसके बाद वह अंधा होने लगा था, उसे अपना निर्णय बदलना पड़ा। तब जाकर उस पर बला टली...

bagwal is very famous festival for uttarakhand citizens
people celebrating bagwal

बाराहीधाम देवीधुरा की पहचान बग्वाल युद्ध से है। सही मायने में देवीधुरा मेले की आत्मा भी बग्वाल है। तीन शताब्दी पूर्व तक उत्तराखंड में देवीधुरा समेत 20 स्थानों पर बग्वाल खेलने की परंपरा थी।

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people celebrating bagwal

तब बग्वाल का स्वरूप सब जगह एक जैसा नहीं था। देवीधुरा को छोड़ बाकी जगहों में बग्वाल के मूल में धार्मिक भावना से ज्यादा अर्थ एवं राजनीति की छाप होती थी। कभी अंग्रेजी हुक्मरानों ने बग्वाल मेले पर पाबंदी लगाने की कोशिश भी की थी। 

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villagers ready for bagwal

इतिहासकार देवेंद्र ओली के मुताबिक दशकों पहले तक सिर्फ देवीधुरा ही नहीं, बल्कि 19 और स्थानों पर बग्वाल की परंपरा थी। पर्वतीय इलाकों में बग्वाल की प्रथा को दर्शाने वाली- दस दसै, बिसी बग्वाल, कालि कुमू, फुलि भंगाल की लोकोक्ति खासी लोकप्रिय थी। आज बग्वाल सिर्फ एक स्थान यानी देवीधुरा के खोलीखांड मैदान में ही आषाढ़ी कौतिक पर होती है। लेकिन कुमाऊं में अंग्रेजी शासन स्थापित होने तक पुलहिंडोला के चमदेवल में बग्वाल खेलने की गौरवशाली परंपरा थी।

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injured people in bagwal festival

बग्वालीचौड़, गुमदेश, बग्वाली, पोखर, सिवौली के रावत, चमोली गढ़वाल के गांवों में बग्वाल की प्रथा रही है। चमोली में बग्वाल मशाल के साथ खेली जाती थी। वहां पत्थर वर्षा का रिवाज नहीं था। कहा जाता है कि अंग्रेजों ने बग्वाल खेलने पर रोक भी लगाई। इससे जुड़े लोगों की धरपकड़ की कार्रवाई भी की। कुमाऊं कमिश्नर ट्रेल ने इस दौरान खासा आतंक मचाया। इसके चलते इलाके की ज्यादातर बग्वाल बंद हो गई। बताते हैं कि देवीधुरा की बग्वाल को बंद कराने के आदेश देने से उसकी नेत्र ज्योति पर असर पड़ने लगा था, जिस कारण कमिश्नर ट्रेल ने देवीधुरा की बग्वाल को चलते रहने दिया।

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