भारतीय क्रिकेट में कुछ ऐसे खिलाड़ी भी हुए जिन्हें योग्यता के बावजूद टीम में मौका नहीं मिला। नतीजतन जल्द ही वे गुमनामी के अंधेरे में खो गए। ऋषिकेश कानिटकर की गिनती उन्हीं खिलाड़ियों में की जाती है। 14 नवंबर 1974 को पुणे में जन्में कानिटकर बुधवार को अपना 44वां जन्मदिन मना रहे हैं।
ऐसे में आइए एक नजर डालते हैं उस मैच पर जिसने न सिर्फ ऋषिकेश कानिटकर को रातों-रात स्टार बना दिया बल्कि उसके बाद भारतीय खिलाड़ियों पर फिक्सिंग के आरोपों के चलते कभी टीम में भी जगह नहीं मिल पाई।
बात 1997-98 की है। बांग्लादेश की आजादी की सिल्वर जुबली के मौके पर ढाका में टूर्नामेंट आयोजित किया गया। तीसरे फाइनल में भारत-पाकिस्तान आमने-सामने थे। 48 ओवर्स के उस मैच में पाक टीम ने पहले बल्लेबाजी करते हुए स्कोरबोर्ड पर 314 रन का विशाल स्कोर खड़ा कर दिया।
भारतीय बल्लेबाजों ने भी मुंहतोड़ जवाब दिया। सचिन तेंदुलकर ने 26 गेंदों में 41 रन बनाए। रॉबिन सिंह ने 82 रन की अहम पारी खेली। सौरव गांगुली भी शतक (124) जमा चुके थे, लेकिन उनके आउट होते ही मध्यक्रम ताश के पत्तों की तरह ढह गया। आखिर में मैच रोमांचक मोड़ पर पहुंच चुका था। गेंदबाजों के साथ क्रीज पर मौजूद कानिटकर पर जीत की जिम्मेदारी थी।
जीत के लिए टीम इंडिया को 2 गेंदों में तीन रन की जरूरत थी। आखिरी ओवर सकलेन मुश्ताक कर रहे थे। इस ओवर में स्ट्राइक मिलते ही चौका लगाकर कानिटकर ने भारत को शानदार जीत दिलाई। इसके बाद कानिटकर को लगा कि वो देश में पॉपुलर हो गए लेकिन इस जीत के नायक रहे ऋषिकेश को इसके बाद कभी टीम में जगह नहीं मिली।