अंग्रेजों के जमाने भी नकली नोट चला करते थे, जिससे बचने के लिए अंग्रेज सरकार नायाब तरीकों का इस्तेमाल करती थी।
चोर, डाकू से लूटने से बचाने के लिए अपनाया था ये तरीका
उस समय नोट को तस्कर और चोर-डाकुओं से बचाने के लिए ऐसे तरीकों का इस्तेमाल करती थी, जिनको पढ़कर आपका भी दिमाग चकरा जाएगा। तब अंग्रेज सरकार करेंसी नोट को डाक से भेजने के नोट के आधे हिस्से को ही भेजते थे। जब यह नोट का हिस्सा तय जगह पर पहुंच जाता था उसके बाद करेंसी डिपार्टमेंट नोट डिस्पैच करने वाले ऑफिस को कंफर्म करता था। कंफर्म होने के बाद नोट के आधे हिस्से को भेजा जाता था और फिर उसको जोड़कर के मार्केट में सर्कुलेट किया जाता था।
पहले चलते थे 10 से लेकर के 1000 रुपये के नोट
अंग्रेजों ने अपने शासनकाल की शुरुआत के 10 साल बाद 1867 में पेपर करेंसी का प्रयोग चालू कर दिया था। इससे पहले मुगलों के शासनकाल में केवल सोने और चांदी के सिक्के चला करते थे।
इंग्लैंड में छपती थी भारतीय करेंसी
आरबीआई म्यूजियम के अनुसार, क्वीन विक्टोरिया के शासनकाल में भारत की करेंसी इंग्लैंड में छपती थी। तब इसके लिए हाथ से बने कागज का इस्तेमाल किया जाता था और पूरा विवरण अंग्रेजी में होता था, क्योंकि यह आम भारतीयों द्वारा प्रयोग में नहीं लाये जाते थे। हालांकि यह भी जब नकली बनने लगे, तो सरकार ने इनको रोक दिया और मार्केट में नए नोट लेकर के आए गए। इसके बाद सरकार की तरफ से केवल 5, 50 और 500 रुपये के नये नोट जारी किये थे जो 1903 से 1923 तक मार्केट में चले थे।