{"_id":"5b31d3394f1c1b264d8b8744","slug":"know-about-indian-weird-temples-and-their-story","type":"photo-gallery","status":"publish","title_hn":"देखिए देश के 7 अजीबोगरीब मंदिर, कहीं चूहों की पूजा तो कहीं मोटरसाइकिल की, मान्यताएं दिलचस्प हैं","category":{"title":"Weird Stories","title_hn":"अजब गजब","slug":"weird-stories"}}
देखिए देश के 7 अजीबोगरीब मंदिर, कहीं चूहों की पूजा तो कहीं मोटरसाइकिल की, मान्यताएं दिलचस्प हैं
फीचर डेस्क, अमर उजाला
Updated Tue, 26 Jun 2018 01:41 PM IST
विज्ञापन
tample
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
आपने मंदिरों में लोगों को देवी-देवताओं की मूर्तियां पूजते हुए तो देखा होगा लेकिन आज हम आपको घर बैठे ऐसे मंदिरों के दर्शन कराने वाले हैं जहां के भगवान को देखकर आप भी हैरत में पड़ जाएंगे। दरअसल, यहां देवी-देवताओं की मूर्तियां नहीं बल्कि कुछ ओर ही पूजा जाता है। इन्हें देखकर आपको भी यकीन नहीं होगा। एक बात और... ऐसा किए जाने के पीछे हर मंदिर की अपनी एक खास कहानी है।
करणी माता का मंदिर बीकानेर
इस मंदिर में होती है चूहों की पूजा, यहां रहते है 20000 चूहे
यहां 20000 से ज्यादा चूहे रहते हैं। इस मंदिर में चूहों का झूठा प्रशाद ही भक्तो को दिया जाता हैं। सबसे बड़ी चौका देने वाली बात यह है की इतने चूहे होने के बाद भी यहां पर कोई बीमारी नहीं फैलती और न ही मंदिर परिसर में कोई बदबू है। चूहों से प्लेग की बीमारी फैलने का डर होता है लेकिन इस मंदिर में आज तक कोई भी भक्त चूहों का झूठा खाने के बावजूद बीमार नहीं हुआ है। यह मंदिर है करणी माता का मंदिर जो राजस्थान के शहर बीकानेर से लगभग 30 किलोमीटर दूर स्थित हैं। इस मंदिर को चूहों वाली माता का मंदिर और चूहों वाला मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। करणी माता का मंदिर बीकानेर रिसायत के महाराजा गंगा सिंह ने बीसवीं शताब्दी में बनवाया था। करणी माता को बीकानेर घराने की कुलदेवी के रूप में भी पूजा जाता है।
यहां 20000 से ज्यादा चूहे रहते हैं। इस मंदिर में चूहों का झूठा प्रशाद ही भक्तो को दिया जाता हैं। सबसे बड़ी चौका देने वाली बात यह है की इतने चूहे होने के बाद भी यहां पर कोई बीमारी नहीं फैलती और न ही मंदिर परिसर में कोई बदबू है। चूहों से प्लेग की बीमारी फैलने का डर होता है लेकिन इस मंदिर में आज तक कोई भी भक्त चूहों का झूठा खाने के बावजूद बीमार नहीं हुआ है। यह मंदिर है करणी माता का मंदिर जो राजस्थान के शहर बीकानेर से लगभग 30 किलोमीटर दूर स्थित हैं। इस मंदिर को चूहों वाली माता का मंदिर और चूहों वाला मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। करणी माता का मंदिर बीकानेर रिसायत के महाराजा गंगा सिंह ने बीसवीं शताब्दी में बनवाया था। करणी माता को बीकानेर घराने की कुलदेवी के रूप में भी पूजा जाता है।
चाइनीज काली मंदिर, कोलकाता
चाइनीज काली मां का मंदिर जहां प्रसाद में मिलती है नूडल्स
चाइनीज काली मां का मंदिर कोलकाता के 'टैंगरा' में स्थित है जो 60 साल पुराना बताया जाता है। इस जगह को चाइनाटाउन भी कहते हैं। इस मंदिर में स्थानीय चीनी लोग पूजा करते हैं। यहां भक्तों को प्रसाद में नूडल्स और फ्राइड राइस बांटा जाता है। मां को चाइनीज व्यंजन का भोग लगता है और फिर यही प्रसाद के रूप में भक्तों के बीच वितरित किया जाता है। इसी वजह से इस मंदिर का नाम चाइनीज काली मां पड़ गया है। 55 साल के इसोन चेन इस मंदिर की देखभाल करते हैं।
इस मंदिर के पीछे एक कहानी बताई जाती है जिसमें बताया जाता है कि इस मंदिर से एक चीनी बच्चे का जुड़ाव भी रहा है। दरअसल, इस मंदिर में काफी समय से बीमार चल रहे एक चीवी बच्चे को लाया गया था। यहां आते ही उसकी बीमारी खत्म हो गई। इसके बाद चीनी लोगों का विश्वास इस मंदिर के प्रति काफी गहरा हो गया।
चाइनीज काली मां का मंदिर कोलकाता के 'टैंगरा' में स्थित है जो 60 साल पुराना बताया जाता है। इस जगह को चाइनाटाउन भी कहते हैं। इस मंदिर में स्थानीय चीनी लोग पूजा करते हैं। यहां भक्तों को प्रसाद में नूडल्स और फ्राइड राइस बांटा जाता है। मां को चाइनीज व्यंजन का भोग लगता है और फिर यही प्रसाद के रूप में भक्तों के बीच वितरित किया जाता है। इसी वजह से इस मंदिर का नाम चाइनीज काली मां पड़ गया है। 55 साल के इसोन चेन इस मंदिर की देखभाल करते हैं।
इस मंदिर के पीछे एक कहानी बताई जाती है जिसमें बताया जाता है कि इस मंदिर से एक चीनी बच्चे का जुड़ाव भी रहा है। दरअसल, इस मंदिर में काफी समय से बीमार चल रहे एक चीवी बच्चे को लाया गया था। यहां आते ही उसकी बीमारी खत्म हो गई। इसके बाद चीनी लोगों का विश्वास इस मंदिर के प्रति काफी गहरा हो गया।
विज्ञापन
विज्ञापन
Shani mandir
इस शनि मंदिर में केसरिया रंग की धोती पहनना जरूरी
महाराष्ट्र के शिगंणापुर नामक गांव में शनिदेव का मंदिर स्थित है। यह मंदिर महाराष्ट्र के अहमदनगर से लगभग 35 कि.मी. की दूरी पर है। इस मंदिर की विशेषता यह है कि यहां स्थित शनिदेव प्रतिमा बगैर किसी गुंबद के खुले आसमान के नीचे एक संगमरमर के चबूतरे पर विराजमान है।
इसके साथ ही इस गांव की एक खास बात है कि यहां किसी भी घर में ताला नहीं लगाया जाता। माना जाता है कि यहां के सभी घरों की सुरक्षा स्वयं शनिदेव करते हैं। कहा जाता है कि यहां पर शनिदेव की पूजा के लिए सभी भक्तों को शरीर को केसरिया रंग की धोती पहनना जरूरी होता है। इसके साथ ही शनिदेव का अभिषेक गीले वस्त्रों में ही किया जाता है।
महाराष्ट्र के शिगंणापुर नामक गांव में शनिदेव का मंदिर स्थित है। यह मंदिर महाराष्ट्र के अहमदनगर से लगभग 35 कि.मी. की दूरी पर है। इस मंदिर की विशेषता यह है कि यहां स्थित शनिदेव प्रतिमा बगैर किसी गुंबद के खुले आसमान के नीचे एक संगमरमर के चबूतरे पर विराजमान है।
इसके साथ ही इस गांव की एक खास बात है कि यहां किसी भी घर में ताला नहीं लगाया जाता। माना जाता है कि यहां के सभी घरों की सुरक्षा स्वयं शनिदेव करते हैं। कहा जाता है कि यहां पर शनिदेव की पूजा के लिए सभी भक्तों को शरीर को केसरिया रंग की धोती पहनना जरूरी होता है। इसके साथ ही शनिदेव का अभिषेक गीले वस्त्रों में ही किया जाता है।
विज्ञापन
amarnath tample
अमरनाथ मंदिर में छिपा अमरत्व का रहस्य
अमरनाथ मंदिर शिव भगवान के सभी मंदिरों में से सबसे प्रमुख है। इस मंदिर में भगवान शिव की शिवलिंग खुद ही निर्मित हो जाती है और इसका आकार घटता बढ़ता रहता है। मान्यता है कि अमरनाथ गुफा में महादेव शिव का वास है। यह हिंदुओं का एक प्रमुख तीर्थस्थल है। यह तीर्थ जम्मू और कश्मीर की राजधानी श्रीनगर से 145 किमी दूर, समुद्र तल से 3888 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यहां स्वत: ही हिम शिवलिंग का निर्माण होता है। अमरनाथ मंदिर व यात्रा का इतना महत्व क्यों है, इसके पीछे एक पौराणिक कथा का उल्लेख मिलता है।
माना जाता है, कि एक बार माता पर्वती ने भगवान शिव से अमरता के रहस्य के बारे में जानने की उत्सुकता प्रकट की। पहले तो भगवान शिव ने बताने से मना कर दिया, लेकिन माता पर्वती के बार-बार अनुरोध करने पर वे मान गए। लेकिन इसे कोई और न जान पाए, इसलिए भगवान शिव और माता पार्वती एकांत के लिए हिमालय पर्वत श्रेणियों की ओर चल दिए। भगवान शिव ने गोपनीयता बनाएं रखने के लिए सबसे पहले पहनगाम में नंदी (बैल) का त्याग किया, फिर अपनी जटाओं से चंद्रमा को चंदनबाड़ी में मुक्त किया, गले से सर्पों को शेषनाग चोटी पर और गणेश को महागुणस की पहाड़ी पर छोड़ देने का निश्चय किया।
इसके बाद पंचतरणी पर पंच तत्व- धरती, वायु, आकाश, अग्नि व जल का परित्याग कर भगवान शिव ने माता पार्वती के साथ एक गुफा के अंदर प्रवेश किया है। वहां भगवान शिव ध्यान मुद्रा में लीन हो गए , तथा आस-पास अग्नि को प्रज्वलित कर दिया, ताकि अन्य कोई प्राणी इस रहस्य को न जान पाए और फिर माता पार्वती को अमरता का रहस्य बताना प्रारंभ किया। लेकिन महादेव शिव के आसन के नीचे कबूतर के अंडे इस अग्नि से भस्म नहीं हुए और उनमें से निकलकर कबूतर के जोड़े ने पूरी कथा को सुनकर अमरत्व का मंत्र जान लिया। आज भी तीर्थयात्रियों को गुफा के अंदर कबूतर का जोड़ा दिखाई देता हैं, जिन्हें अमर पक्षी माना जाता है। चूंकि अमरता के रहस्य का वर्णन इस गुफा के अंदर हुआ था, इसलिए इसे अमरनाथ गुफा कहा जाने लगा।
अमरनाथ मंदिर शिव भगवान के सभी मंदिरों में से सबसे प्रमुख है। इस मंदिर में भगवान शिव की शिवलिंग खुद ही निर्मित हो जाती है और इसका आकार घटता बढ़ता रहता है। मान्यता है कि अमरनाथ गुफा में महादेव शिव का वास है। यह हिंदुओं का एक प्रमुख तीर्थस्थल है। यह तीर्थ जम्मू और कश्मीर की राजधानी श्रीनगर से 145 किमी दूर, समुद्र तल से 3888 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यहां स्वत: ही हिम शिवलिंग का निर्माण होता है। अमरनाथ मंदिर व यात्रा का इतना महत्व क्यों है, इसके पीछे एक पौराणिक कथा का उल्लेख मिलता है।
माना जाता है, कि एक बार माता पर्वती ने भगवान शिव से अमरता के रहस्य के बारे में जानने की उत्सुकता प्रकट की। पहले तो भगवान शिव ने बताने से मना कर दिया, लेकिन माता पर्वती के बार-बार अनुरोध करने पर वे मान गए। लेकिन इसे कोई और न जान पाए, इसलिए भगवान शिव और माता पार्वती एकांत के लिए हिमालय पर्वत श्रेणियों की ओर चल दिए। भगवान शिव ने गोपनीयता बनाएं रखने के लिए सबसे पहले पहनगाम में नंदी (बैल) का त्याग किया, फिर अपनी जटाओं से चंद्रमा को चंदनबाड़ी में मुक्त किया, गले से सर्पों को शेषनाग चोटी पर और गणेश को महागुणस की पहाड़ी पर छोड़ देने का निश्चय किया।
इसके बाद पंचतरणी पर पंच तत्व- धरती, वायु, आकाश, अग्नि व जल का परित्याग कर भगवान शिव ने माता पार्वती के साथ एक गुफा के अंदर प्रवेश किया है। वहां भगवान शिव ध्यान मुद्रा में लीन हो गए , तथा आस-पास अग्नि को प्रज्वलित कर दिया, ताकि अन्य कोई प्राणी इस रहस्य को न जान पाए और फिर माता पार्वती को अमरता का रहस्य बताना प्रारंभ किया। लेकिन महादेव शिव के आसन के नीचे कबूतर के अंडे इस अग्नि से भस्म नहीं हुए और उनमें से निकलकर कबूतर के जोड़े ने पूरी कथा को सुनकर अमरत्व का मंत्र जान लिया। आज भी तीर्थयात्रियों को गुफा के अंदर कबूतर का जोड़ा दिखाई देता हैं, जिन्हें अमर पक्षी माना जाता है। चूंकि अमरता के रहस्य का वर्णन इस गुफा के अंदर हुआ था, इसलिए इसे अमरनाथ गुफा कहा जाने लगा।