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जब इस गांव में हुआ उल्लू का अंतिम संस्कार और श्राद्ध, कंफ्यूज हो गया पूरा देश
फीचर डेस्क, अमर उजाला
Updated Sun, 25 Feb 2018 11:25 AM IST
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भारत एक विचित्र देश है। विदेशी लोगों के लिए तो यह सबसे ज्यादा अजीबोगरीब स्थान है। यहां की संस्कृति, रहन-सहन, खान-पान, धर्म व जाति आदि को लेकर उनके मन में यह विचार आते है। यह बात हम भली-भांति समझ सकते हैं। लेकिन कई बार यह देश खुद यहां रहने वालों लोगों के लिए विचित्र हो जाता है। इसकी वजह है यहां आए दिन घटने वाली विचित्र घटनाएं।
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जी हां, भारत में रोजाना कई ऐसे मामले सामने आते हैं जो इस देश को औरों से अलग बनाता है। आज हम आपको एक ऐसी ही घटना से अजीबोगरीब घटना से रूबरू कराएंगे।
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एक रिपोर्ट के मुताबिक यह मामला बिहार के सुपौल जिले का है। यहां के एक गांव में एक उल्लू का विधि-विधान के साथ न केवल अंतिम संस्कार किया गया, बल्कि उसके बाद श्राद्ध कर ब्रह्मभोज भी कराया गया है। क्या आप इस बात पर यकीन करेंगे..? शायद नहीं।
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रिपोर्ट की माने तो यह घटना हकीकत है। कर्णपुर गांव में बीते दिनों एक उल्लू का भव्य अतिम संस्कार किया गया। इसके साथ ही बड़े स्तर पर ब्रह्मभोज भोज का प्रसाद भी बांटा गया। लेकिन इसकी असल वजह क्या है ये भी जान लें...
दरअसल, इस क्षेत्र के प्राचीन राधा-कृष्ण मंदिर में एक उल्लू घायल अवस्था में पाया गया। ग्रामीणों ने उसे उठाकर उसका इलाज कराया, लेकिन इसके बाद भी उसकी जान नहीं बचाई जा सकी।
दरअसल, इस क्षेत्र के प्राचीन राधा-कृष्ण मंदिर में एक उल्लू घायल अवस्था में पाया गया। ग्रामीणों ने उसे उठाकर उसका इलाज कराया, लेकिन इसके बाद भी उसकी जान नहीं बचाई जा सकी।
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इसके बाद ग्रामीणों ने उसका विधि-विधान के साथ अंतिम संस्कार करने का निर्णय किया। आपकी जानाकारी के लिए बता दें कि उल्लू देवी लक्ष्मी का वाहक माना जाता है। इस कारण गांव वालों ने अंतिम संस्कार का निर्णय लिया। उल्लू के शव को नववस्त्र में लपेटकर रखा गया।
इसके बाद बड़ी संख्या में लोग उसके अंतिम दर्शन करने के लिए पहुंचे। मंदिर परिसर में ही उल्लू का अंतिम संस्कार किया गया। इतना ही नहीं इसके बाद उल्लू का श्राद्धकर्म करने का निर्णय लिया गया। पूरे गांव से इसके लिए एक बड़ी राशि एकत्रित की गई थी, और मंदिर परिसर में ही कुंवारी कन्याओं का भोजन कराया गया।
इसके बाद बड़ी संख्या में लोग उसके अंतिम दर्शन करने के लिए पहुंचे। मंदिर परिसर में ही उल्लू का अंतिम संस्कार किया गया। इतना ही नहीं इसके बाद उल्लू का श्राद्धकर्म करने का निर्णय लिया गया। पूरे गांव से इसके लिए एक बड़ी राशि एकत्रित की गई थी, और मंदिर परिसर में ही कुंवारी कन्याओं का भोजन कराया गया।