Trending News: साधु-संतों के त्याग की कई कहानियां सुनने और पढ़ने को मिलती हैं। जापान के भिक्षुओं के त्याग की कोई हद नहीं थी। वह जीवित रहते ही अपने आप को ममीज में बदल लेते थे। इसका उद्देश्य यह था मौत के बाद उनके को कोई नुकसान न हो यानी सड़े न। अभी भी लोग इन भिक्षुओं के शव को देखने के लिए दूर-दूर से आते हैं। जापान में प्राचीन भिक्षुओं को sokushinbutsu के नाम से जाना जाता है। यह भिक्षु बिना भोजन और पानी के रहते थे। जब वह ऐसा नहीं कर पाते थे, तो जहर पीते थे। वे शुगेंडो नाम के बौद्ध धर्म की एक प्राचीन प्रथा का पालन करते थे।
Trending: मौत के बाद शव न सड़े, इसके लिए सालों तक भूखे रहते, फिर पीते जहर, इतनी कठिन तपस्या करते थे भिक्षु
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इसके साथ ही वह उरुशी पेड़ के रस से बनी जहरीली चाय पीने लगे लगते थे। इसकी छाल में एक जहरीला तत्व पाया जाता है। इन सभी की वजह से भिक्षुओं को उलटी होती थी। शरीर में पानी की भारी कमी हो जाती थी।
बताया जाता है कि ऐसे करने से भिक्षुओं की मौत के बाद शरीर को संरक्षित करने में मदद मिलती थी। इससे शरीर के सभी कीड़े और परजीवी मर जाते थे, जिनकी वजह से शरीर सड़ता है। 1000 दिन यानी लगभग तीन साल तक ऐसा करने के बाद भिक्षु 100 दिन के लिए भोजन और पानी की जगह सिर्फ कम मात्रा में नमक वाला पानी पीते थे।
इसके बाद भिक्षु अपनी मौत का इंतजार करने के लिए ध्यान करते थे। मौत को करीब आने पर भिक्षु अपने शिष्यों से कहते थे उन्हें तीन मीटर गहरे गड्ढे के नीचे एक बॉक्स में डाल दें। गहरे ताबूतों में भिक्षु ध्यान करते थे। इसके साथ बाॅक्स में हवा के लिए एक पाइप और घंटी होती थी। घंटी जब तक बजती थी, तब तक भिक्षु को जिंदा माना जाता। घंटी बजनी बंद हो जाती थी, तो मान लिया जाता था कि भिक्षु की मौत हो गई।
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हालांकि कुछ भिक्षुओं के शव संरक्षित नहीं रह पाए। जब ताबूत खोलकर देखा गया, वो सड़ चुके थे। जिन भिक्षुओं के शव संरक्षित हुए उनकी भी पूजा नहीं की जाती।
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