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Trending: मौत के बाद शव न सड़े, इसके लिए सालों तक भूखे रहते, फिर पीते जहर, इतनी कठिन तपस्या करते थे भिक्षु

Wed, 10 Jan 2024 01:38 PM IST
धर्मेंद्र सिंह फीचर डेस्क, अमर उजाला
फीचर डेस्क, अमर उजाला Published by: धर्मेंद्र सिंह Updated Wed, 10 Jan 2024 01:38 PM IST
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Monks poisoned themselves with 1,000-day diet so their fat-free corpses wouldn't rot
Trending News - फोटो : iStock

Trending News: साधु-संतों के त्याग की कई कहानियां सुनने और पढ़ने को मिलती हैं। जापान के भिक्षुओं के त्याग की कोई हद नहीं थी। वह जीवित रहते ही अपने आप को ममीज में बदल लेते थे। इसका उद्देश्य यह था मौत के बाद उनके को कोई नुकसान न हो यानी सड़े न। अभी भी लोग इन भिक्षुओं के शव को देखने के लिए दूर-दूर से आते हैं। जापान में प्राचीन भिक्षुओं को sokushinbutsu के नाम से जाना जाता है। यह भिक्षु बिना भोजन और पानी के रहते थे। जब वह ऐसा नहीं कर पाते थे, तो जहर पीते थे। वे शुगेंडो नाम के बौद्ध धर्म की एक प्राचीन प्रथा का पालन करते थे। 



एक मीडिया रिपोर्ट में एटलस ऑब्स्कुरा के हवाले से बताया गया है कि तीन साल तक भिक्षु एक खास तरह का भोजन लेते थे। इसमें वह नट्स और बीज खाते थे। इसके साथ ही शारीरिक गतिविधि में शामिल होते थे, ताकि शरीर की चर्बी कम हो। इसके बाद अगले तीन साल वह छाल और जड़ें खाते थे।

 

Monks poisoned themselves with 1,000-day diet so their fat-free corpses wouldn't rot
Trending News - फोटो : @skull_b0nes/X

इसके साथ ही वह उरुशी पेड़ के रस से बनी जहरीली चाय पीने लगे लगते थे। इसकी छाल में एक जहरीला तत्व पाया जाता है। इन सभी की वजह से भिक्षुओं को उलटी होती थी। शरीर में पानी की भारी कमी हो जाती थी। 
 

Monks poisoned themselves with 1,000-day diet so their fat-free corpses wouldn't rot
Trending News - फोटो : iStock

बताया जाता है कि ऐसे करने से भिक्षुओं की मौत के बाद शरीर को संरक्षित करने में मदद मिलती थी। इससे शरीर के सभी कीड़े और परजीवी मर जाते थे, जिनकी वजह से शरीर सड़ता है। 1000 दिन यानी लगभग तीन साल तक ऐसा करने के बाद भिक्षु 100 दिन के लिए भोजन और पानी की जगह सिर्फ कम मात्रा में नमक वाला पानी पीते थे। 
 

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Monks poisoned themselves with 1,000-day diet so their fat-free corpses wouldn't rot
Trending News - फोटो : iStock

इसके बाद भिक्षु अपनी मौत का इंतजार करने के लिए ध्यान करते थे। मौत को करीब आने पर भिक्षु अपने शिष्यों से कहते थे उन्हें तीन मीटर गहरे गड्ढे के नीचे एक बॉक्स में डाल दें। गहरे ताबूतों में भिक्षु ध्यान करते थे। इसके साथ बाॅक्स में हवा के लिए एक पाइप और घंटी होती थी। घंटी जब तक बजती थी, तब तक भिक्षु को जिंदा माना जाता। घंटी बजनी बंद हो जाती थी, तो मान लिया जाता था कि भिक्षु की मौत हो गई। 


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Monks poisoned themselves with 1,000-day diet so their fat-free corpses wouldn't rot
Trending News - फोटो : iStock

हालांकि कुछ भिक्षुओं के शव संरक्षित नहीं रह पाए। जब ताबूत खोलकर देखा गया, वो सड़ चुके थे। जिन भिक्षुओं के शव संरक्षित हुए उनकी भी पूजा नहीं की जाती।

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