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हीरे की पहचान करने वाले जौहरी की आंख में होती है ये खास चीज, तब परख पाते हैं हीरा

Fri, 02 Aug 2019 07:23 AM IST
पंखुड़ी सिंह फीचर डेस्क, अमर उजाला
फीचर डेस्क, अमर उजाला Published by: पंखुड़ी सिंह Updated Fri, 02 Aug 2019 07:23 AM IST
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know how gemstone grader checks diamond quality
हीरे की क़ीमत उसकी क्लैरिटी, कलर और कट से तय होती है. यह काम मशीन से बेहतर इंसान की आंखें करती हैं. हीरा कैसा है, यह उसके कट से पता चलता है. उसमें कितनी चमक है और वह कितनी रोशनी बिखेरता है, यह उसकी क्लैरिटी से जुड़ा है. यह हीरे को तराशने वाले के शिल्प कौशल पर भी निर्भर करता है. रोशनी हीरे में ऊपर से घुसती है और अंदर फैलती है. छोटे-छोटे कई कट शानदार इफ़ेक्ट्स पैदा करते हैं.
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हीरे को अच्छे से तराशा गया हो तो रोशनी उसके अंदर नाचती हुई सी लगती है. जेमोलॉजिकल इंस्टीट्यूट ऑफ़ अमरीका के चीफ़ क्वालिटी अफ़सर जॉन किंग एक पेशेवर डायमंड और जेमस्टोन ग्रेडर हैं. हीरों की ग्रेडिंग करते समय समय वह कई ख़ूबियों को देखते हैं. हीरे और दूसरे रत्न क्लैरिटी, कलर, कट और कैरेट के पैमाने पर आंके जाते हैं. किसी रत्न की क़ीमत शुद्धता, रंगहीनता या कोई विशेष रंग और आकार, इन सब पर निर्भर करती है. किसी रत्न में ये सारी ख़ूबियां एक साथ मिल जाएं तो वह दुर्लभ और बेशक़ीमती बन जाता है.
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किंग कहते हैं, "मेरी आंखों की रोशनी सामान्य है. जो दूसरों से अलग है वह प्रशिक्षण और लगातार निरीक्षण से आया है." वह गहराई और बारीकी से बारीक अंतर को देखने की कोशिश करते हैं. किंग ख़ूबसूरती से तराशे गए एक गोलाकार हीरे को माइक्रोस्कोप की रोशनी के सामने ले जाकर उसकी जादूगरी दिखाते हैं. वह कहते हैं, "गोल हीरा अपने सतह के पार रौशन और अंधेरे क्षेत्रों का एक सुंदर पैटर्न बनाता है." फिर वह उसी आकार और रंग के दूसरे हीरे को माइक्रोस्कोप की रोशनी के सामने ले जाते हैं. दूसरे हीरे से बिखर रही रोशनी को देखकर वह कहते हैं, "यह पहले हीरे जैसा नहीं है." दूसरे हीरे में खनिज की कुछ मात्रा रह गई है. उसकी शुद्धता का ग्रेड भी अलग है. उसमें पहले हीरे की तरह रोशनी और अंधेरे का पैटर्न नहीं बनता.

इमेराल्ड कट वाले हीरे में लंबी सपाट सतह होती है जो रोशनी का अलग इफेक्ट पैदा करती है. इसमें रोशनी को परावर्तित करने के लिए कम कट्स होते हैं जिससे ऐसा लगता है कि इसमें रोशनी धीरे-धीरे समा रही हो. लंदन के ज्वेलर ग्राफ के डेनियल बकबी कहते हैं, "डायमंड ग्रेडर हीरे को रोशनी के सामने ले जाकर और उससे फैल रही रोशनी को देखकर उसकी क्वालिटी के बारे में जान लेते हैं." "यदि अच्छे से तराशा गया हो तो यह चमकदार दिखेगा फीका नहीं. अगर इसके किनारे बहुत मोटे कटे हों तो वहां काला घेरा बन जाएगा." हीरे की क़ीमत पर छोटी-छोटी चीजों से भी फ़र्क़ पड़ जाता है.
 

बकबी कहते हैं, "रत्नों के रंग का आंकलन करने के लिए हर काम आंख से किया जाता है. रत्न के रंग की पहचान इंसान ही करते हैं, लेकिन आप क्या तलाश रहे हैं यह वास्तव में उस रत्न पर निर्भर करता है. उदाहरण के लिए रूबी (माणिक्य) की क़ीमत उसके गहरे लाल रंग से होती है. माणिक्य के दीवाने पिजन ब्लड रूबी (रत्नराज) की तलाश में रहते हैं." बकबी कहते हैं, "माणिक्य तेज़ी से लुप्त हो रहे हैं इसलिए बाज़ार में गुलाबी रंग के कई पत्थर आ गए हैं, मगर उनको कोई नहीं पूछता. माणिक्य और नीलम एक ही पत्थर के दो रूप हैं. 
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इसमें लोहे के भी अंश होते हैं, जिससे इसे लाल रंग मिलता है. पत्थर में लोहे का ऑक्साइड जितना ज़्यादा होगा, उसका रंग उतना ही गहरा लाल होगा. दूसरे किसी भी रंग के कुरंड से मिले रत्न को नीलम कहा जाता है. इसमें गुलाबी पत्थरों को भी शामिल किया जाता है. लेकिन गुलाबी नीलम और हल्के रंग के माणिक्य के बीच अंतर करना बहुत मुश्किल है. बकबी का कहना है कि रत्नों में कई स्तर पर भिन्नताएं होती हैं. हर रत्न अपने आप में अनूठा होता है. सरकारी निकाय दिशानिर्देश तय कर सकते हैं, लेकिन हर रत्न अलग होता है. आखिर में, फ़ैसला जौहरी ही करते हैं.

किंग कहते हैं, "मुझे याद है कि करियर की शुरुआत में मैंने नीले रंग का एक हीरा देखा था. मुझे लगता है कि उस क्षण ने मुझे हमेशा के लिए बदल दिया. मैंने पहले किसी रत्न को इतना ख़ूबसूरत रंग का नहीं देखा था. वह मेरे दिल में बस गया. पांच साल पहले मैंने उस रत्न को फिर देखा और मुझे फिर वैसा ही लगा. किंग के पास न्यूयॉर्क के हंटर कॉलेज से फ़ाइन आर्ट्स में मास्टर्स डिग्री है. लेकिन न्यूयॉर्क टाइम्स में एक विज्ञापन देखकर वह रत्नों की पहचान का काम करने लगे थे. उस दिन को वह आज भी अपनी ख़ुशक़िस्मती समझते हैं. उनका कहना है कि रत्नों का मूल्यांकन करने में फ़ाइन आर्ट्स की उनकी ट्रेनिंग बहुत काम आती है. बुढ़ापा आने पर आंखों की रोशनी घट जाना स्वाभाविक है, लेकिन किंग यहां भी अपने लिए एक मौक़ा देखते हैं.

उनको लगता है कि आंखों की रोशनी घटने पर फ़ाइन आर्ट्स की उनकी ट्रेनिंग का फ़ायदा हो सकता है. वह कहते हैं, "हम बहुत सी कलाकृतियों को देखते हैं जिनको चित्रकार ने अपने 80 के दशक में बनाया है. मुझे लगता है कि नज़र कमज़ोर होने पर भी वे दूसरे तरीक़े से अपने ज्ञान और अनुभव का इस्तेमाल कर लेते हैं. रत्न के भीतर खनिज की बहुत थोड़ी सी मात्रा जमा हो तो भी उसकी चमक और क्लैरिटी पर असर पड़ जाता है. इन अशुद्धियों को केवल इंसान की आंखें ही पकड़ सकती हैं. कुछ मामलों में रत्न को तराशने वाले अपने हुनर से इनको छिपा लेने की कोशिश करते हैं. वे उनके आसपास की सतह में बदलाव कर देते हैं.

बकबी कहते हैं, "रत्न के भीतर के खनिजों को लेजर से ख़त्म किया जा सकता है. लेज़र से बना छेद इतना छोटा होता है कि उसे नंगी आंखों से देखा नहीं जा सकता. कुछ रत्नों में ये खनिज होते ही होते हैं. जैसे पन्ना में यह हमेशा मिलता है क्योंकि वह दूसरे रत्नों की तरह कठोर नहीं होता. हीरे की तुलना में पन्ने की क़ीमत पर इसका असर भी कम पड़ता है.
 
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