भारत सहित दुनिया के तमाम देशों में सोना विशेष महत्व की धातु है। इस पीली धातु की उत्पति को लेकर तमाम तरह की कहानियां प्रचलित है। वैज्ञानिक समुदाय में भी एक राय नहीं है, लेकिन वैज्ञानिकों के एक बड़े तबके का मानना है कि धरती के भीतर मौजूद सोना धरती की संपत्ति नहीं है और यह अंतरिक्ष से उल्कापिंडों के जरिए आया है।
क्या सच में अंतरिक्ष से धरती पर आया है सोना? हैरान करते हैं वैज्ञानिकों के दावे
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इस कीमती पीली धातु की उत्पति के बारे में वैज्ञानिक जो तर्क पेश कर रहे हैं उसपर शायद ही किसी को भरोसा हो, लेकिन वैज्ञानिकों के पास इसके ठोस सबूत हैं। मूल रूप से मुलायम धातु सोना के बारे में वैज्ञानिक जॉन एमस्ली का दावा है कि यह धातु अंतरिक्ष से उल्का पिंडों के रूप में धरती पर आया और इसी कारण यह धरती के बाहरी हिस्से में पाया जाता है।
वैसे सोने की उपलब्धता के बारे में पिछले कुछ दशकों से चर्चा में आए इस सिद्धांत पर वैज्ञानिक समुदाय को मुहर लगानी है। इस सिद्धांत की वकालत करने वालों का कहना है कि धरती के बाहरी तह, जो करीब 25 माइल मोटा है, में घूलने वाले हर 1000 टन धातुओं में केवल 1.3 ग्राम सोना था। करीब साढ़े चार अरब साल पहले धरती की उत्पति के बाद इसकी सतह ज्वालमुखी और पिघले हुए चट्टानों से भरी पड़ी थी। इसके बाद लाखों सालों में धरती के बाहरी परत में घुलते हुए लोहा धरती के केंद्र में पहुंच गया है। संभवतः इसके साथ सोना भी पिघलकर धरती के बाहरी परत में मिल गया।
इम्पीरियल कॉलेज, लंदन के भूगर्भशास्त्री मथिया विलबोल्ड का कहना है कि इस तर्क पर इतनी आसानी से भरोसा नहीं किया जा सकता था इसलिए विज्ञान को इसकी विवेचना करनी पड़ी। विलबोल्ड का कहना है, 'सिद्धांत यह है कि धरती के मुख्य हिस्से के गठन के बाद उल्का पिंडों की बौछार हुई जो धरती से टकराए। इन उल्का पिंडों में कुछ मात्रा में सोना था और इसने धरती के बाहरी सतह को सोने से भर दिया।' विलबोल्ड ने कहा कि यह सिद्धांत उल्का पिंडों की गतिविधियों से मेल खाता है, जैसा कि वैज्ञानिक समझते हैं। यह घटना करीब 3.8 अरब साल पहले घटी होगी।
दरअसल, सन 1970 के दशक में आपोलो के चंद्रमा पर उतरने के बाद उल्कापिंडों के जरिए धरती पर सोना आने का सिद्धांत दिया गया। वैज्ञानिकों ने चंद्रमा पर चट्टानों से लिए गए नमूनों में उसकी सतह से लिए गए नमूनों की तुलना में कम रेडियम और सोना पाया। यह धरती की सतह और चट्टानों में पाए जाने वाले सोने से भी कम था। इससे यह माना गया कि धरती और चांद पर अंतरिक्ष से रेडियम युक्त उल्कापिंड गिरे थे। उल्कापिंडों की इस बारिश के बाद ये तत्व चांद पर तो वे वैसे ही पड़े रहे लेकिन धरती की आंतरिक गतिविधियों के कारण वे उसमें समाहित हो गए। इस विचार को 'लेट वेनीर हाइपोथेसिस' कहा गया और यह ग्रहीय विज्ञान का एक मूलभूत सिद्धांत बन गया।