रूस की सीमा पर बसे डोबरुसा गांव में आज से करीब 30 साल पहले 200 लोग रहते थे, लेकिन आज के समय में इस गांव में महज एक व्यक्ति रहता है। दरअसल, सोवियत संघ के टूटने के बाद ही इस गांव के लोग आस-पास के शहरों या अन्य दूसरे जगहों पर बसने के लिए चले गए, तो वहीं कुछ लोगों का निधन भी हो गया। इन सब के बावजूद भी साल 2020 के शुरुआत में यहां तीन लोग बच गए थे।
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डोबरुसा गांव
- फोटो : सोशल मीडिया
डोबरुसा गांव में बचे तीन लोगों में से एक दंपत्ति जेना और लिडा की बीते फरवरी में हत्या हो गई। इसके बाद से ही इस गांव में सिर्फ एक व्यक्ति गरीसा मुनटेन बचा है। भले ही गरीसा मुनटेन के साथ कोई नहीं रहता है, लेकिन ये गांव में अकेले नहीं हैं। इनके साथ बहुत से जीव रहते हैं। गरीसा 5 कुत्ते, 9 टर्की पक्षी, 2 बिल्लियां, 42 मुर्गियां, 120 बत्तखें, 50 कबूतर और कई हजार मधुमक्खियां के साथ अपना जीवन बिता रहे हैं।
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डोबरुसा गांव
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गरीसा मुनटेन ने इस बारे में बताया, "उनके गांव के करीब 50 घर थे, लेकिन अब अधिकतर लोग सोवियत संघ के टूटने के बाद नजदीकी शहर मालडोवा, रुस या फिर यूरोप में जाकर बस चुके हैं।" गरीसा इस बात को मानते हैं कि अकेले रहने के वजह से कई तरह की परेशानियों का सामना भी करना पड़ता है।
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गरीसा मुनटेन
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हालांकि, अपना अकेलापन दूर करने के लिए गरीसा ने एक अनोखा तरीका अपनाया है। गरीसा मुनटेन बताते हैं, "खेतों में काम करने के दौरान वह पेड़ों से, पक्षियों से, जानवरों से ही बातें करते रहते हैं।"
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डोबरुसा गांव
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65 वर्षीय गरीसा मुनटेन के मुताबिक, "पहले गांव के दूसरे छोर पर जेना और लिडा लोजिंस्की रहते थे और वह अक्सर उनसे फोन पर या मिलकर बातें करते रहते थे, लेकिन अब उनकी मौत के बाद वह यहां बिल्कुल अकेले हो गए हैं। अब उनसे बात करने वाला यहां कोई नहीं है।"