कोविड-19 की चपेट में आए दुनिया के कई देशों की तुलना में भारत में इस संक्रमण से काफी कम लोगों की मौत हुई है। इसकी खूब चर्चा हो रही है। कुछ लोग इतनी कम मृत्यु दर के रहस्य पर बात कर रहे हैं तो कुछ का कहना है कि भारत कोरोना वायरस की घातक मार से खुद को बचाने में कामयाब दिख रहा है। कुछ लोग कोरोना वायरस के ग्लोबल हॉटस्पॉट्स की तुलना में प्रमुख भारतीय शहरों में कम मौतों पर सवाल कर रहे हैं।
भारत में कोरोना वायरस से कम मौतों का रहस्य क्या है?
भारत में कोरोना वायरस से मौतें किस कदर बढ़ रही हैं, इसे समझने के लिए यह देखना होगा ये कितने दिनों में दोगुनी हो रही हैं। भारत में इस वक्त मौतें नौ दिनों में दोगुनी हो रही हैं। 25 अप्रैल तक यहां 825 मौतें हो चुकी थी, जबकि 16 अप्रैल को ये मौतें लगभग इनकी आधी थी। विशेषज्ञों का कहना है कि यह भारत के लिए बेहद राहत की बात है क्योंकि संक्रमण के इस स्टेज में न्यूयॉर्क में दो या तीन दिन में ही मौतों का आंकड़ा दोगुना तक पहुंच जा रहा है।
पब्लिक हेल्थ सेक्टर के कई विशेषज्ञों और पेशेवरों का कहना है कि भारत में संक्रमण और मौतें अगर काबू में हैं तो इसके पीछे एक महीने से ज्यादा वक्त से चल रहे कड़े लॉकडाउन का रोल हो सकता है। मेडिकल जर्नल लान्सेट ने भी इसकी पुष्टि की है और कहा है कि लॉकडाउन, संक्रमण के बढ़ते ग्राफ को सपाट करने में मुफीद साबित हुआ है।
कुछ लोगों का मानना है कि भारत में युवा आबादी ज्यादा है और इस वजह से संक्रमण से मौतें कम हो रही हैं। बुजुर्गों में इस संक्रमण से मौत का जोखिम ज्यादा होता है। कुछ हलकों में इस बात पर भी चर्चा हो रही है भारत में जिस वायरस का अटैक हुआ है, वह कम खतरनाक किस्म का है।
साथ ही कुछ लोग यह भी अंदाजा लगा रहे हैं कि शायद भारत के गर्म मौसम की वजह यह वायरस उतनी तेजी से यहां नहीं फैल रहा है, जितनी तेजी से ठंडे मौसम वाले पश्चिमी देशों में। हालांकि इन दावों और कयासों की अभी तक कोई पुष्टि नहीं हुई है। इसके उलट, कोविड-19 के गंभीर मरीजों का इलाज कर रहे डॉक्टरों का कहना है कि भारत में फैला कोरोना वायरस उतना ही संक्रामक है, जितना किसी और दूसरे देश में हो सकता है। तो क्या यह माना जाए कि भारत सचमुच कोरोना वायरस से होने वाली मौतों के मामले में काफी पीछे है?
क्या भारत में कम टेस्टिंग की वजह से मौतों का आंकड़ा कम?
कुछ लोग इससे इत्तेफाक नहीं रखते। भारतीय मूल के अमरीकी चिकित्सक और कैंसर रोग विशेषज्ञ सिद्दार्थ मुखर्जी ने पत्रकार बरखा दत्त से हाल में कहा, "साफ कहूं तो भारत में इतनी कम मौतों के बारे में मैं कुछ नहीं जानता। दुनिया को भी इसके बारे में कुछ पता नहीं है। इतनी कम मौतें एक रहस्य है। मेरा तो मानना है कि कुछ हद तक कम टेस्टिंग इसके लिए जिम्मेदार है। भारत में हम पर्याप्त संख्या में टेस्टिंग नहीं कर रहे हैं। अगर हम ज्यादा टेस्टिंग कर रहे होते तो हमें इस सवाल का जवाब मिल सकता था।''
वह साफ तौर पर दोनों तरह के टेस्ट- डायगोनेस्टिक (संक्रामक लोगों की पहचान के लिए इस्तेमाल होने वाला) और एंटीबॉडी टेस्ट (संक्रमित और ठीक हो चुके व्यक्ति का टेस्ट) की ओर इशारा कर रहे थे। एक बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत कोविड-19 से हुई मौतों का पता नहीं लगा पा रहा है।
कोरोना वायरस संक्रमण से प्रभावित कई देशों ने अनजाने में ही सही, मौतों की अंडर रिपोर्टिंग की है। मौतों के आंकड़ों की स्टडी के बाद न्यूयॉर्क टाइम्स ने पाया कि कोरोना वायरस से संक्रमण के दौरान मार्च में अमेरिका में कम से कम और 40 हजार मौतें हुई थी। इन मौतों में कोविड-19 के साथ दूसरी वजहों से हुई मौतें भी शामिल थी।
'फाइनेंशियल टाइम्स' ने हाल में कोरोना वायरस संक्रमण के दौरान 14 देशों में हुई मौतों का विश्लेषण किया था। अखबार के मुताबिक कोरोना वायरस से हुई मौतें आधिकारिक आंकड़ों से 60 फीसदी ज्यादा हो सकती हैं। हालांकि 'न्यूयॉर्क टाइम्स' और 'फाइनेंशियल' टाइम्स की स्टडी में भारत को शामिल नहीं किया गया था।
भारत की महत्वाकांक्षी 'मिलियन डेथ स्टडी' का नेतृत्व करने वाले टोरंटो यूनिवर्सिटी के प्रभात झा कहते हैं कि मौतों के आंकड़ों की रिपोर्टिंग सही तरीके से हो। कोरोना वायरस से हुई जिन मौतों की गिनती छूट गई हैं, उन्हें इसमें शामिल करना जरूरी है। प्रभात झा का कहना है कि भारत में ज्यादातर मौत घरों में होती है, और यहां आगे भी ऐसा ही होता दिखता है। इसलिए मौतों के सही आंकड़े के लिए दूसरे तरीके आजमाने भी जरूरी हैं।