अगर किसी रोज हमारी धरती से कोई क्षुद्र ग्रह या उल्कापिंड टकरा जाए, तो क्या होगा? क्या ऐसी किसी आफत को आने से रोका जा सकता है? क्योंकि उल्कापिंड या धूमकेतु अगर पृथ्वी से टकराया तो भारी तबाही मच सकती है। ब्रह्मांड में बहुत से उल्कापिंड, धूमकेतु और क्षुद्र ग्रह तैर रहे हैं। ये बेकाबू हैं और किसी भी ग्रह के गुरुत्वाकर्षण के दायरे में आने पर उससे टकराकर खत्म हो जाते हैं। ऐसा टकराव भारी तबाही ला सकता है।
क्या धरती पर तबाही से पहले उल्कापिंड का पता लगाया जा सकता है?
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बोत्सवाना के जंगलों में खोज
ऐसी ही एक टीम हाल ही में अफ्रीकी देश बोत्सवाना गई थी। इस टीम ने लगातार पांच दिनों तक जंगलों में मशक्कत की। कांटेदार झाडियों और घास की मोटी परत के बीच ये वैज्ञानिक एक खास चीज तलाश रहे थे। उन्हें मोटे तौर पर तो इस बात का अंदाजा था कि उन्हें 200 वर्ग किलोमीटर के दायरे में किस जगह पर उसे खोजना है। लेकिन, उस एस्टेरॉयड के टुकडे बहुत ही छोटे थे। इसलिए उसे ढूंढ पाना मुश्किल हो रहा था। किसी को क्या पता कि क्षुद्र ग्रह के वो टुकडे कहीं दब गए हों? या हवा में उड गए हों? तभी अचानक वैज्ञानिकों की नजर एक काले, धूल भरे पत्थर पर पडी। ये हमारी धरती का नहीं था। ये बाहर से आया था।
एक महीने पहले खगोलविदों की एक टीम ने पूर्वानुमान लगाया था कि एक क्षुद्र ग्रह धरती से आकर उसी जगह टकराएगा। इसका नाम 2018 एलए रखा गया था। ये रात के वक्त बोत्सवाना के जंगलों में गिरा था। धरती के वातावरण में आकर ये जल गया था और इसके टुकडे बिखर गए थे। इस क्षुद्र ग्रह के टुकडे मिलने से खगोलविदों की एक बात सही साबित हुई। और हमारे इतिहास में ऐसा केवल दूसरी बार हुआ था कि किसी क्षुद्र ग्रह को वैज्ञानिकों ने अंतरिक्ष में देखा और फिर उसके टुकडे धरती पर मिले।
लोगों को सूचित करना होगा आसान?
जिस टीम ने इस टुकडे को खोजा, उसे ये उम्मीद है कि दूरबीनों की मदद से एक दिन ऐसी घटना के प्रति लोगों को आगाह किया जा सकेगा। अगर खतरा गंभीर होगा, टकराने वाला कोई धूमकेतु या उल्कापिंड बडे आकार का होगा, तो ये चेतावनी दुनिया को बडी तबाही से बचा लेगी। जब 2018 एलए नाम का ये क्षुद्र ग्रह अंतरिक्ष में तैर रहा था, तो इसे कैटालिना स्काई सर्वे नाम की संस्था की दूरबीन ने देखा था। ये प्रोजेक्ट नासा की मदद से चलाया जा रहा है। इस क्षुद्र ग्रह को एटलस यानी एस्टेरॉयड टेरेस्ट्रियल इम्पैक्ट लास्ट एलर्ट सिस्टम की दूरबीन ने भी देखा था।
एटलस सिस्टम अमरीका की हवाई यूनिवर्सिटी का है। ये दूरबीनों का ऐसा सिस्टम है, जिसका मकसद धरती की तरफ आ रहे बडे-बडे उल्कापिंडों या क्षुद्र ग्रहों से आगाह करना है। एटलस सिस्टम की स्थापना जॉन टोनरी ने की है, जो एक खगोलविद हैं। उन्हें इस सिस्टम की स्थापना करने की प्रेरणा उन चर्चाओं से मिली थी, जिनमें ये कहा जा रहा था कि किसी उल्कापिंड या धूमकेतु के धरती से टकराने की संभावना बहुत ही कम है। शायद हजार दो हजार साल में कभी एक बार ऐसा हो सकता है।
तब गई थी सिर्फ 1 शख्स की जान
टोनरी कहते हैं कि, "मुझे इन बातों से हैरानी होती थी। लोग बडे यकीन के साथ ऐसे दावे करते थे। जबकि हमारी धरती से किसी क्षुद्र ग्रह के टकराने की सबसे हालिया घटना करीब 100 साल पहले हुई थी।"
टोनरी का इशारा साइबेरिया के टुंगुस्का में एस्टेरॉयड के जलने की तरफ था। जिसमें 8 करोड से ज्यादा पेड तबाह हो गए थे। ये एक वीरान इलाका था। सोचिए, अगर वो क्षुद्र ग्रह किसी बडी आबादी वाले इलाके के ऊपर वातावरण में जला होता तो? हम इसकी कल्पना मात्र से ही सिहर उठते हैं कि तब कितनी बडी तबाही मची होगी। हालांकि 1908 में साइबेरिया की घटना में केवल एक व्यक्ति की जान गई थी।
टोनरी के एटलस सिस्टम के तहत अब तक दो दूरबीनें लगाई गई हैं। दोनों ही अमरीका के हवाई में हैं। हालांकि टोनरी बहुत जल्द दक्षिण अफ्रीका में एक दूरबीन लगाने वाले हैं, ताकि धरती के दक्षिणी गोलार्ध के आसमान के ऊपर भी निगरानी की जा सके। जल्द ही एक चौथी दूरबीन लगाने के लिए भी पैसा जुटाया जाएगा। जब एटलस सिस्टम पूरी तरह काम करने लगेगा, तो टोनरी को उम्मीद है कि हमें किसी भी संभावित खतरे की जानकारी पहले से मिल जाएगी। हमें इतना वक्त मिल जाएगा कि हम लोगों को टकराने वाली संभावित जगह से हटा सकें।
बोत्सवाना में एस्टेरॉयड के जो टुकड़े मिले, उनकी मदद से हमें आज ये यकीन है कि एटलस सिस्टम से ऐसे किसी खतरे का सही-सही अंदाजा लगाया जा सकता है। 2018 एलए नाम का ये क्षुद्र ग्रह किस जगह टकराएगा, इसका सटीक अंदाजा लगाना बडी उपलब्धि है। क्योंकि, ये बहुत छोटा सा, केवल दो मीटर का चट्टान का टुकडा मात्र था।