गरीबों का पेट भरने के लिए इस करोड़पति ने बेच दी संपत्ति, कंगाल होकर कहलाए 'लंगर वाले बाबा'
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
अस्पताल के बाहर गाड़ी लगाकर खिलाते थे खाना
इस बीच, मैंने एक बार अपने पुत्र के आठवें जन्मदिन को समाज के हित में मनाने का फैसला किया। मेरे पास पैसों की कमी नहीं थी, इसलिए मैंने सोचा कि क्यों न उस खास दिन गरीब बच्चों को लंगर खिलाया जाए। उस दिन करीब डेढ़ सौ बच्चे लंगर में शामिल हुए। वह लंगर मेरी जिंदगी का एक बड़ा दिन साबित हुआ।
दरअसल, वे बच्चे जो अच्छा खाना खा रहे थे, मुझे उनके चेहरे पर एक अलग ही खुशी दिखी। वह दृश्य देखकर मुझे अनायास ही अपना संघर्ष भरा बचपन याद आ गया। उसी पल मैंने तय कर लिया कि मैं अपनी संपत्ति इन्हीं के जैसे जरूरतमंद लोगों के खाली पेट भरने में खर्च करूंगा।
तत्काल मैंने उन बच्चों के लिए दैनिक लंगर का आयोजन शुरू कर दिया। इसके कुछ दिनों बाद गुरु गोविंद सिंह जयंती के अवसर पर शहर के एक बड़े अस्पताल के सामने से गुजरते हुए मैंने देखा कि वहां एक लड़का गरीब मरीजों को चावल खिला रहा था। सेवा का यह स्वरूप भी मुझे भा गया। मैंने उस अस्पताल के बाहर अपना लंगर कार्यक्रम शुरू कर दिया। हर दिन एक निश्चित समय पर अस्पताल के गेट के सामने मैं खाना लेकर अपनी गाड़ी के साथ पहुंचने लगा।
83 साल के हैं जगदीश लाल आहूजा
इस काम के लिए मैंने धन को कभी आड़े नहीं आने दिया। जब ज्यादा जरूरत पड़ी, तो अपनी संपत्ति बेचना शुरू कर दी। एक वक्त ऐसा भी आ गया कि मुझे अपनी करोड़ों रुपयों की कई संपत्तियां बेचनी पड़ गईं। इसके बावजूद मेरा लंगर जारी रहा। पिछले कई वर्षों में एक दिन भी ऐसा नहीं बीता है, जिस दिन मैंने लोगों को खाना नहीं खिलाया है।
तिरासी की उम्र में मेरी ताकत, मेरा धन और सामर्थ्य लगातार खत्म होता जा रहा है, पर लंगर खिलाने की मेरी इच्छाशक्ति में जरा-सी भी कमी नहीं आई है। मेरे काम को देखते हुए लोग मुझे ‘लंगर वाले बाबा’ के नाम से पुकारते हैं।
मैंने कभी किसी से जबरन कोई मांग नहीं की है, लेकिन इस विषम परिस्थिति में गरीबों के खाली पेट देखकर सरकार से कुछ सहायता की उम्मीद जरूर करता हूं। मैं यही चाहता हूं कि भविष्य में मेरे जाने के बाद भी मेरा लंगर जारी रहे।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।