Signs of Relationship Failure in Astrology: हर व्यक्ति चाहता है कि उसके जीवन में जो भी कोई खास व्यक्ति आए वह सदैव उसके साथ खड़ा रहे, फिर चाहे वो सुख हो या दुख। लेकिन आजकल आपको अक्सर यही सुनने को मिलता है कि किसी का ब्रेकअप हो गया या किसी का तलाक हो गया है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, हमारी कुंडली में कुछ खास ग्रह और योग ऐसे होते हैं जो हमारे प्रेम जीवन को सीधा तौर पर प्रभावित करते हैं। पंचम भाव (प्यार का भाव) और सप्तम भाव (शादी का भाव) अगर किसी अशुभ ग्रह के प्रभाव में आ जाएं, जैसे शनि, राहु, केतु या मंगल, तो प्यार में धोखा, दूरी या बार-बार ब्रेकअप की स्थिति बन जाती है।
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कभी-कभी चंद्रमा की स्थिति भी कमजोर होती है, जिससे मन में अस्थिरता आती है और रिश्ते में झगड़े बढ़ जाते हैं। ऐसे में बार-बार संबंध टूटने लगते हैं। आइए जानते हैं कि किन ग्रहों और योगों की वजह से प्यार में दिक्कतें आती हैं और साथ ही कुछ आसान उपाय भी बताएंगे, जिन्हें अपनाकर आप अपने रिश्तों को बेहतर बना सकते हैं।
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शनि का दुष्प्रभाव
अगर कुंडली में शनि ग्रह पंचम भाव (प्यार का घर) या सप्तम भाव (शादी का घर) पर दृष्टि डाल रहा हो, तो व्यक्ति के रिश्ते धीरे-धीरे ठंडे पड़ने लगते हैं। बातचीत कम हो जाती है, इमोशन्स दबने लगते हैं और रिश्ता बोझ जैसा लगने लगता है। शनि आपको ज्यादा सोचने वाला और कम बोलने वाला बना देता है, जिससे प्यार में वह गर्मजोशी नहीं रहती।
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राहु एवं केतु की स्थिति
राहु जब पंचम भाव में होता है, तो जातक को प्यार में धोखा खाने का अनुभव बार-बार होता है। इस ग्रह के कारण रिश्ते झूठ, दिखावे या स्वार्थ पर टिकते हैं। राहु प्रेम को भ्रम में बदल देता है, जिससे व्यक्ति कभी सच्चे रिश्ते को पहचान ही नहीं पाता।
केतु एक अलगाव देने वाला ग्रह है। अगर ये पंचम या सप्तम भाव में बैठा हो, तो इंसान को या तो प्यार मिलता ही नहीं, और अगर मिले भी, तो दिल नहीं लगता। रिश्तों में सूखापन आ जाता है, और व्यक्ति बहुत जल्दी बोर हो जाता है।
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चंद्रमा पर राहु/केतु का प्रभाव
चंद्रमा मन का कारक है। अगर चंद्रमा राहु या केतु के साथ बैठा हो, तो व्यक्ति का मन अस्थिर हो जाता है। रिश्तों में छोटी-छोटी बातों पर झगड़े शुरू हो जाते हैं, और ऐसा लगता है कि सामने वाला समझ ही नहीं रहा। इससे अक्सर ब्रेकअप तक बात पहुंच जाती है।
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मंगल का प्रभाव
मंगल अगर 5वें, 7वें या 8वें भाव में हो, तो रिलेशनशिप में गुस्सा, तकरार, वर्चस्व की भावना या “मैं ही सही हूँ” वाला रवैया बढ़ जाता है। ऐसे लोग अक्सर लड़ाई में बात को बढ़ा देते हैं और रिश्ता टूटने की कगार पर पहुंच जाता है।