छोटी सी बात पर नौकरी में आरक्षण न देना गलत: सुप्रीम कोर्ट
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि छोटी सी बातों को लेकर सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग के लोगों को नौकरी के मिलने वाले आरक्षण से महरूम नहीं किया जा सकता। शीर्ष अदालत ने कहा है कि सदियों से प्रताड़ित और अभावग्रस्त लोगों के साथ ऐसा करना उचित नहीं है। ऐसा करना सरकारी नौकरी में असमानता खत्म करने की परिकल्पना के खिलाफ है।
न्यायमूर्ति टीएस ठाकुर और न्यायमूर्ति वी गोपाल गौड़ा की पीठ ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस आदेश को दरकिनार कर दिया है जिसमें एक व्यक्ति को दिल्ली सरकार के अस्पताल में नियुक्ति देने से सिर्फ इसलिए इनकार कर दिया गया था कि वह वक्त पर अपना ओबीसी सर्टिफिकेट जमा करने में असफल रहा था।
पीठ ने हाईकोर्ट के आदेश को गलत बताते हुए कहा कि आरक्षण का संवैधानिक सिद्धांत न केवल संविधान की प्रस्तावना में है, बल्कि मूल अधिकारों (अनुच्छेद-14,15,16) और राज्य के नीति निर्देशक तत्वों (अनुच्छेद-39ए) में निहित है। इसके तहत समाज के हर वर्ग को समान अवसर मिलने की बात कही गई है।
समय पर जमा नहीं कराया का सर्टिफिकेट
गौरतलब है कि राम कुमार गिजरोया वर्ष 2008 में दिल्ली अधीनस्थ चयन बोर्ड द्वारा स्टाफ नर्स की परीक्षा में शामिल हुआ था। इस परीक्षा में वह सफल रहा। शार्ट लिस्ट किए गए नामों में उसका नाम भी शामिल था, लेकिन अंतिम सूची से उसका नाम गायब था। जब राम कुमार ने इस बारे में पूछताछ की तो उसे बताया गया कि चूंकि उसने तय समय के भीतर ओबीसी प्रमाणपत्र जमा नहीं किया गया था इसलिए उसका चयन नहीं किया गया।
बोर्ड के इस निर्णय के खिलाफ राम कुमार ने दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। एकल पीठ ने दिल्ली सरकार को एक महीने के भीतर उसके आवेदन पर विचार करने को कहा था, लेकिन इस फैसले के खिलाफ की गई अपील पर खंडपीठ ने आदेश दिया कि चूंकि उसने तय तारीख के 10 दिनों के बाद ओबीसी सर्टिफिकेट जमा कराया था, लिहाजा उसे किसी तरह की रियायत नहीं दी जा सकती।
अब सुप्रीम कोर्ट ने खंडपीठ के फैसले को दरकिनार करते हुए एकल पीठ के फैसले को सही बताया है। शीर्ष अदालत ने इंदिरा साहने (मंडल कमीशन) का हवाला देते हुए कहा है कि ओबीसी के लोगों को आरक्षण इसलिए दिया जाता है कि वह सामान्य वर्ग के छात्रों के साथ प्रतिस्पर्धा कर सकें।