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राष्ट्रपति शासन और नए चुनाव की ओर बढ़ी दिल्ली

Tue, 10 Dec 2013 01:17 AM IST
अमर उजाला, दिल्ली
अमर उजाला, दिल्ली Updated Tue, 10 Dec 2013 01:17 AM IST
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delhi move on to president rule and new election

दिल्ली में सरकार बनाने को लेकर भाजपा और आम आदमी पार्टी (आप) दोनों ही बड़ी उधेड़बुन में हैं।

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दोनों ही पार्टियां राजनीतिक मजबूरियों के चलते अल्पमत या जोड़तोड़ के जरिए सरकार बनाने से बच रही हैं। सरकार बनाने में दोनों दलों की इस आनाकानी से दिल्ली में राष्ट्रपति शासन की संभावना भी बढ़ गई है।

त्रिशंकु विधानसभा का जनादेश मिलने के बाद बने सियासी हालात ने चुने गए विधायकों में बेचैनी बढ़ा दी है। भाजपा पहले ही साफ कर चुकी है कि वे सरकार बनाने का दावा करने नहीं जाएगी।
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हालांकि पार्टी विधानमंडल दल की बैठक बुलाकर अंतिम निर्णय मंगलवार को लिया जाएगा। इस दौरान पार्टी उप राज्यपाल के बुलावे का इंतजार करती रहेगी।

बताया जाता है कि एक फॉर्मूला यह भी पेश किया जा रहा है कि वाजपेयी की केंद्र की 13 दिन वाली सरकार की तर्ज पर दिल्ली में भी एक बार सरकार का गठन कर लिया जाए। फिर जनता के बीच जाकर सहानुभूति बटोरी जाए।

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भाजपा को डर भी है कि उसके मौका छोड़ने पर कहीं आप यह मौका न लपक ले और बेहतर प्रशासन देकर जनता का भरोसा जीत ले। बहरहाल, यही उधेड़बुन आप में भी चल रही है। आप में भी सोमवार को बैठकों का दौर जारी रहा।

सूत्र बता रहे हैं कि दोनों ही दलों के कुछ नेता सरकार बनाने का मौका न छोड़ने की भी वकालत कर रहे हैं। वहीं, राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक दोनों पार्टियां कांग्रेस या एक दूसरे को तोड़कर समर्थन हासिल करने के मूड में नहीं हैं।

ऐसा माना जा रहा है कि दोनों पार्टियां टूटी फूटी सरकार बनाने के बजाय फिर से जनता के बीच जाकर अपने लिए पूर्ण बहुमत देने की गुजारिश करेंगी।

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क्या हैं विकल्प
दिल्ली के उप राज्यपाल नजीब जंग को 18 दिसंबर तक सरकार बनाने की प्रक्रिया पूरी करनी है। नियमानुसार उप राज्यपाल सबसे ज्यादा 32 सीट पाने वाली भाजपा को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करेंगे। भाजपा के इनकार के बाद आप पार्टी को बुलाया जाएगा। मगर दोनों के सरकार बनाने से हाथ खड़े करने के चलते यह कसरत रस्म अदायगी ही मानी जा रही है।

ऐसे में उप राज्यपाल के पास सदन को निलंबित कर राष्ट्रपति शासन लगाना ही एकमात्र विकल्प बचा है। इन हालात में दिल्ली में एक बार फिर चुनाव होने की संभावना भी प्रबल हो गई है। माना जा रहा है कि यह विधानसभा चुनाव 2014 के आम चुनाव के साथ ही करवाए जाएंगे।

भाजपा की मजबूरी
दरअसल भाजपा यह नहीं चाहती कि इन हालात में कमजोर सरकार बनाकर आप को विपक्ष में बिठाए। भाजपा के रणनीतिकारों ने पार्टी हाईकमान को आगाह किया है कि व्यवस्था परिवर्तन के नाम पर जनता का समर्थन हासिल करने वाली आप पार्टी भाजपा को आसानी से काम नहीं करने देगी। ऐसे में 2014 चुनाव आते आते कम से कम दिल्ली में मोदी की भ्रष्टाचार और महंगाई के खिलाफ छवि पर खासा असर पड़ेगा।

आप की दिक्कत
आप भी सरकार चलाने की व्यावहारिक सच्चाईयों से बचे रहना चाह रही है। आप में इस बात पर मंत्रणा चल रही है कि भाजपा अगर आप की अल्पमत की सरकार बनाने पर राजी हो भी जाती है तो भी वह अपने एजेंडे को आगे नहीं ले जा पाएगी। ऐसे में आप से जनता की उम्मीदों को करारा झटका लगेगा। राजनीति में लंबा सफर तय करने की योजना में लगी आप पार्टी शुरुआत में ही यह जोखिम नहीं उठाना चाहती।

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