झारखंडः एक गांव, 36 मौत और सिसकती जिंदगियां
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केंद्र और राज्य सरकारें एनआरएचएम जैसी योजनाओं पर हजारों करोड़ रुपये फूंकने का दावा करती हों लेकिन उनका लाभ ग्रामीण इलाकों को कितना मिल पाता है इसकी बानगी है झारखंड का प्रतापपुर गांव। जहां एक बीमारी के चलते 36 लोगों की मौत हो चुकी है और सैकडों लोग इसकी चपेट में आकर दर्दभरी जिदंगी जीने को मजबूर हैं।
मामला है राजधानी रांची से 220 किलोमीटर दूर गरहवा जिले के प्रतापपुर गांव का। एनडीटीवी की खबर के अनुसार दूषित जल के कारण पूरा गांव स्केलेटल फ्लोरोसिस नाम की बीमारी की चपेट में है।
इसी बीमारी से पीड़ित गांव की 55 वर्षीय महिला पतिया देवी जिंदा तो हैं लेकिन वो ऐसी जिंदगी जी रही हैं जो मौत से भी बदतर है। हो सकता है वो उस सूची की 37वीं सदस्य हों जो दशक भर में इस बीमारी के कारण अपनी जान गंवा चुके हैं।
पतिया देवी की हड्डियां कमजोर हो चुकी हैं और हाथ पैर बुरी तरह से ऐंठ कर मुड़ चुके हैं। विशेषज्ञ बताते हैं कि भूजल में अत्याधिक फ्लोराइड के कारण पानी इस कदर दूषित हो चुका है कि लोग पीते ही स्केलेटल फ्लोरोसिस बीमारी की चपेट में आ जाते हैं।
पानी के रास्ते यह शरीर में जाकर लोगों की हड्डियों में जम जाता है और शरीर में कमजोरी आनी शुरू हो जाती है। डॉक्टर भी मानते हैं कि इस बीमारी का कोई इलाज नहीं है केवल शुद्ध पानी पीकर ही इसका बचाव किया जा सकता है।
सरकार के रवैये से ग्रामीण निराश
बताते हैं कि प्रतापपुर के भूजल में फ्लोराइड की मात्रा झारखंड के अन्य क्षेत्रों के मुकाबले सात गुना अधिक है। तीन साल से इस बीमारी से जूझ रही पतिया देवी तभी से बिस्तर पर हैं। भूजल के रास्ते उनके शरीर में प्रवेश कर चुके फ्लोराइड ने हाथ और पैर की सारी हड्डियों को मोड़ कर इस कदर विकृत कर दिया है कि पहली बार उन्हें देखते ही कोई भी सिहर उठे।
पतिया देवी के पति गनौरी राम बताते हैं कि यह सब भूजल में प्रदूषण के कारण हुआ है, मेरे परिवार में हर कोई इसका मरीज है। कितनों की अब तक मौत हो चुकी है। वो निराश लहजे में कहते हैं कि मुझे नहीं लगता सरकार इस दिशा में कोई प्रयास कर रही है।
प्रतापपुर विभिन्न बस्तियों का गांव है, जिसमें मनुहा टोला दलितों का एक मोहल्ला है। यहां के तीस परिवार इस बीमारी की चपेट में हैं। गांव के 12 में से मात्र दो हैंडपंप से ही फ्लोराइड राहित जल मिलता है। गांव वाले बताते हैं कि क्षेत्र में फ्लोराइड के प्रभाव का पहला मामला 1998 में सामने आया था। इसके बाद साल 2000 में सरकार ने यहां पहला सर्वे कराया, लेकिन तब से शुरू हुआ मौतों का सिलसिला आज तक नहीं थमा।
वहीं गरहवा की सबसे बड़ी अधिकारी नेहा अरोडा मानती हैं कि यहां हालात चिंताजनक हैं। हमने यहां कई क्षेत्रों को चिह्नित किया है। हम प्रयास कर रहे हैं कि सारे हैंडपंप को फ्लोराइड मुक्त करा दिया जाए। इसके अलावा गांव में पाइप लाइन से पानी की सप्लाई की व्यवस्था भी की जा रही है।
Published by Harendra singh moral