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मोकामा ग्राउंड रिपोर्ट: बिहार की सियासत में खूनी धूल की परत...अब बाहुबल से मुक्ति चाहता है युवा वर्ग

Tue, 04 Nov 2025 06:08 AM IST
Rajkishor राजकिशोर
Updated Tue, 04 Nov 2025 06:08 AM IST
सार

बिहार का माहौल राजनीतिक वर्चस्व में हुई हत्या में जदयू प्रत्याशी अनंत सिंह की गिरफ्तारी के बाद गरमाया हुआ है। अब नजरें आगामी छह और 11 नवंबर को होने वाली वोटिंग पर है। 14 नवंबर को नतीजों का एलान होगा। जानिए कैसे हैं मोकामा के जमीनी हालात

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Mokama Ground Report Anant Singh layer of bloody dust Bihar politics now youth want freedom from muscle power
मोकामा में दशकों से रहा है अनंत सिंह का दबदबा - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

बिहार की इस मिट्टी में एक पुरानी कहावत है कि यहां धूल सिर्फ उड़ती नहीं, इतिहास भी लिखती है...और इसी धूल में खड़े होकर तारतर की सड़क पर लोगों ने फिर से गुजरा हुआ बिहार देखा। उसे देखने और समझने अमर उजाला की टीम भी पहुंची।

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बिहार के सबसे धनवान इलाके मोकामा में राजनीतिक वर्चस्व में हुई हत्या और जदयू प्रत्याशी अनंत सिंह की गिरफ्तारी के बाद मामला पूरे बिहार में गरमाया है। पर, उससे भी महत्वपूर्ण बिंदु है सियासत पर इसका असर क्या है? अब मोकामा का युवा उस दौर को देखना नहीं चाहता, जहां जातीय श्रेष्ठता का बोध या गुटबंदी यहां के आकाश पर अपराध और दहशत की कालिमा लगाने को तैयार हो।
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युवाओं को बिहार में या मोकामा में वह दौर नहीं चाहिए, जब सत्ता की भाषा बंदूकों व कारतूसों से लिखी जाती थी। वोट सिर्फ मत नहीं, ताकत की घोषणा हुआ करते थे। नब्बे के दशक में अखबारों की सुर्खियां...कहीं अपहरण, कहीं नरसंहार, कहीं चुनावी हत्याएं थीं। लालू-राबड़ी शासन और जंगलराज का शब्द उसी समय राजनीतिक शब्दावली में स्थायी जगह ले गया। जहानाबाद की धरती पर नक्सली सेनाएं और प्रतिहिंसक जन्म यानी रणवीर सेना बनी थी। तब यहां की रातें सिर्फ अंधेरी नहीं, बल्कि खौफ से सनी होती थीं। यही वह पृष्ठभूमि थी जिसमें बिहार की राजनीति में बाहुबली अध्याय फूटा। कोई जाति के बुर्ज पर खड़ा होकर ताकत दिखाता था तो कोई अपराध व राजनीति की साझेदारी से साम्राज्य चलाता था। तब चुनाव क्षेत्र नहीं, इलाके कहलाते थे। शासन दिल्ली-पटना से आकार पाती थी, असली कानून स्थानीय सरकार तय करती थी। इन्हीं कहानियों के बीच मोकामा भी एक केंद्र बना।

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Mokama Ground Report Anant Singh layer of bloody dust Bihar politics now youth want freedom from muscle power
जदयू उम्मीदवार अनंत सिंह की गिरफ्तारी के बाद प्रचार की कमान लल्लन सिंह ने संभाली। साथ में डिप्टी CM - फोटो : अमर उजाला प्रिंट / एजेंसी
मोकामा का बदलता भूगोल: श्री बाबू से बाहुबल तक
गंगा किनारे फैला यह इलाका खेत-खलिहान और उद्योग से सरसब्ज था। पटना से पूरब की ओर बाढ़ जिले से सटा पंडारक, बीच में टाल और मोकामा शहर। आजाद बिहार के पहले मुख्यमंत्री श्री बाबू यानी श्रीकृष्ण सिंह की यह कर्मभूमि थी। रेलवे बोगी बनाने का कारखाना भारत वैगन से लेकर बाटा और मैकडावेल शराब जैसी फैक्ट्रियां यहां रहीं। जमीन इतनी उपजाऊ कि रबी की ऐसी फसलें कहीं नहीं होतीं।

इसके बावजूद 1990 के दशक से एक नया भूगोल एके-47 और कारतूस का उभरा। पहले दिलीप सिंह, फिर छोटे भाई अनंत सिंह और उनके दुश्मन सूरजभान सिंह का नाम श्री बाबू के साथ-साथ अन्य चीजों पर काले बादलों की तरह छा गया। दो चेहरे, दो धारे, दो इलाकाई ध्रुव।

मोकामा में गैंगवार ने बहुत लाशें गिराईं। नब्बे के दशक में अपराध, रंगदारी और गैंगवार के आगे यह भी नहीं पता चला कि सबसे ज्यादा करोड़पति भी मोकामा से आते हैं। समय के साथ अपराध पर कुछ लगाम लगी, लेकिन पहचान अनंत और सूरजभान ही बने रहे। जातीय गोलबंदी और सामाजिक समीकरणों का ऐसा खेल है कि ये डॉन ही यहां से विधायक बने रहे। मोकामा से डीजीपी समेत बड़े अफसर भी निकले, पर पहचान बाहुबल की ही रही।

दुलारचंद हत्याकांड ने फिर कुरेदा अतीत
मोकामा पर त्रिकोणीय मुकाबला दिख रहा है। जदयू ने अनंत सिंह को टिकट दिया, तो राजद से टिकट दूसरे डॉन सूरजभान की पत्नी वीणा सिंह को मिल गया। भूमिहार बहुल मोकामा में ये दोनों डॉन भी इसी जाति के हैं। तीसरे प्रत्याशी जनसुराज पार्टी के पीयूष प्रियदर्शी अति पिछड़ा धानुक जाति से आते हैं। दुलारचंद की हत्या ने पुराने बिहार को फिर कुरेद दिया है। चुनाव आयोग की सख्ती के बाद अनंत सिंह की गिरफ्तारी हो गई।

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सूरजभान की पत्नी व राजद उम्मीदवार वीणा सिंह प्रचार करते हुए। - फोटो : अमर उजाला प्रिंट / एजेंसी
जातीय समीकरणों का गणित...
करीब 80 हजार भूमिहार हैं। यादव वोट 45 हजार है, धानुक 25 हजार, पासवान 15 हजार और निषाद करीब 14 हजार हैं। अति पिछले धानुक वोटर नीतीश के साथ जुड़ते रहे हैं। इस दफा जनसुराज के पीयूष थे और दुलारचंद साथ हो गए थे, इसलिए वह भी खेल में दिख रहे थे। यादव की हत्या के बाद मामला अगड़ा बनाम पिछड़ा होता दिखाई पड़ा। अब अनंत की गिरफ्तारी के बाद भूमिहारों का ज्यादातर वोट उनके साथ ही जा सकता है। धानुक और यादव वोट का कुछ हिस्सा पीयूष की तरफ जा सकता है। उधर, सूरजभान की पत्नी वीणा सिंह के लिए समस्या खड़ी हो गई। भूमिहार के साथ यदि यादव वोट का कुछ हिस्सा भी राजद के बजाय दूसरी तरफ जाता है तो उन्हें नुकसान है।

युवाओं की खामोशी : गुस्सा और नोटा
गैंगवार के बाद लगभग सभी जातियों के युवा बेहद नाराज हैं। हालांकि जदयू के बड़े नेता ललन सिंह अब कई दर्जन गाड़ियों के साथ अनंत सिंह के पक्ष में प्रचार में जुट गए हैं। हालांकि कई युवा इस पूरे परिदृश्य से असहज हैं। उनमें  खामोशी है। वजह डर से ज्यादा गुस्सा है। टाल में एक बुजुर्ग धीमी आवाज में कहते हैं, हमने वह दौर देखा है जब घर में चिराग भी बुझाकर सोना पड़ता था, लेकिन अब बच्चे पढ़ रहे हैं और नौकरी ढूंढ़ रहे हैं। बातचीत से समझ आता है कि यहां पर अब जनता खून के रंग को नहीं, स्याही के निशान को पहचानना चाहती है। युवा कहते हैं-हम डर के बीच जन्मे, पर डर में जीना नहीं चाहते। हम बिहार छोड़ने नहीं, बदलने वाले हैं। इसके लिए वे नोटा का बटन दबाकर आक्रोश दर्ज कराने पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं। मोकामा की हवा में पुरानी कहानियां आज भी बहती हैं, पर उन पर एक नई परत चढ़ रही है- नौकरी, कानून-व्यवस्था, सम्मान, और शांत जीवन की परत।
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