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झारखंड हाईकोर्ट : जेपीएससी मुख्य परीक्षा में हस्तक्षेप याचिका खारिज, एकल पीठ का आदेश कायम

Mon, 26 Oct 2026 07:03 PM IST
राहुल कुमार अमर उजाला ब्यूरो, रांची।
अमर उजाला ब्यूरो, रांची। Published by: राहुल कुमार Updated Mon, 26 Oct 2026 07:03 PM IST
सार

झारखंड हाईकोर्ट ने 11वीं से 13वीं संयुक्त जेपीएससी मुख्य परीक्षा का परिणाम रद्द करने की मांग वाली याचिका पर हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया है। मुख्य न्यायाधीश एमएस सोनक और न्यायाधीश मनोज प्रसाद की पीठ ने इस मामले में अपीलकर्ताओं की हस्तक्षेप याचिका खारिज कर दी। विस्तार से पढ़ें पूरा मामला...

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Jharkhand High Court: Plea seeking intervention in JPSC Main Examination dismissed; single-bench order upheld
झारखंड उच्च न्यायालय - फोटो : Social Media

विस्तार

झारखंड उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश एमएस सोनक और न्यायाधीश मनोज प्रसाद की पीठ ने 11वीं से 13वीं संयुक्त जेपीएससी मुख्य परीक्षा का परिणाम रद्द करने की मांग वाली याचिका खारिज करने के एकलपीठ के आदेश के खिलाफ दायर अपील पर सुनवाई की। अदालत ने सुनवाई के बाद अपीलकर्ताओं की ओर से दाखिल हस्तक्षेप याचिका को खारिज कर दिया। पीठ ने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार द्वारा परीक्षा निरस्त करने से संबंधित मामले में एकलपीठ सुनवाई पूरी कर आदेश सुरक्षित रख चुकी है। इस कारण हस्तक्षेप याचिका पर कोई नया आदेश पारित नहीं किया जा सकता।

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एकलपीठ के फैसले को दी चुनौती
अदालत के न्यायाधीश दीपक रोशन की एकलपीठ ने 11वीं से 13वीं संयुक्त जेपीएससी मुख्य परीक्षा के परिणाम को रद्द करने की मांग वाली याचिका पहले ही खारिज कर दी थी। यह याचिका अयूब तिर्की और राजेश कुमार की ओर से दायर की गई थी। एकलपीठ ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद याचिका को निराधार मानते हुए खारिज कर दिया था। एकलपीठ का कहना था कि याचिकाकर्ताओं ने समय पर आपत्तियां नहीं उठाईं और मूल्यांकन प्रक्रिया में ऐसी कोई खामी नहीं पाई गई जिसके आधार पर मुख्य परीक्षा परिणाम रद्द किया जा सके।
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डिजिटल मूल्यांकन पर उठाए सवाल
याचिकाकर्ताओं ने अपनी याचिका में झारखंड लोक सेवा आयोग की मूल्यांकन प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े किए थे। उनका आरोप था कि आयोग ने उत्तर पुस्तिकाओं का डिजिटल मूल्यांकन कराया, जो परीक्षा के निर्धारित नियमों के विपरीत था। इसके साथ ही क्षेत्रीय भाषा की उत्तर पुस्तिकाओं की जांच कम अनुभव वाले परीक्षकों से कराने का आरोप लगाया गया था। याचिकाकर्ताओं के अनुसार नियमों के तहत कम से कम 10 वर्ष का अनुभव रखने वाले परीक्षकों से ही उत्तर पुस्तिकाओं का मूल्यांकन कराया जाना अनिवार्य था।
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आयोग ने आरोपों को बताया निराधार
दूसरी ओर एकलपीठ में सुनवाई के दौरान आयोग ने अपना पक्ष रखते हुए कहा था कि याचिकाकर्ता परीक्षा में सफल नहीं हो पाए, इसलिए परिणाम जारी होने के बाद मूल्यांकन प्रक्रिया पर सवाल उठा रहे हैं। आयोग का तर्क था कि यदि अभ्यर्थियों को परीक्षा पद्धति पर कोई आपत्ति थी, तो उन्हें पहले ही इसे उठाना चाहिए था। आयोग ने स्पष्ट किया कि सभी अभ्यर्थियों के लिए समान नियम लागू किए गए थे और मूल्यांकन में किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं किया गया।

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