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आमिर खान के टीवी शो से मिला आइडिया, अब महिलाओं को ऐसे दिलवाते हैं ये नौकरी

Thu, 30 Nov 2017 11:35 AM IST
राजेंद्र बंधु परमार
राजेंद्र बंधु परमार Updated Thu, 30 Nov 2017 11:35 AM IST
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women learning driving under Azad Foundation in madhya pradesh
जब मैं हायर सेकेंडरी में पढ़ाई कर रहा था, मध्य प्रदेश में नर्मदा बचाओ आंदोलन की अगुआ मेधा पाटकर काफी सक्रिय थीं। उनसे प्रभावित होकर मैं उनके संपर्क में आया और उसी वक्त समाज के लिए कुछ करने की प्रेरणा ने मेरे अंदर जगह बना ली थी। एलएलबी करने के बाद मैं एक एनजीओ से जुड़ गया। एनजीओ से जुड़ने के पीछे आजीविका के अतिरिक्त मन का काम करने की इच्छा भी थी। 2008 में मैंने नौकरी छोड़ दी और दो साल बाद और आजादी से काम करने के लिए अपनी खुद की संस्था- ‘समान’का गठन किया। इस संस्था के गठन के पीछे मेरा 
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उद्देश्य महिलाओं को समाज में बराबरी का हक दिलाना था। दरअसल उस वक्त मैं अपने शहर इंदौर में घरेलू हिंसा की खबरों से व्यथित था। मैंने सोचा कि अपने कानूनी ज्ञान की मदद से ऐसी महिलाओं की न्यायिक सहायता मुहैया करानी चाहिए। अपनी सोच को हकीकत में बदलते हुए मैंने कई महिलाओं की मदद भी की। मैंने देखा कि उन महिलाओं को अदालती न्याय तो मिल जाता है, पर सामाजिक और पारिवारिक जीवन में उनकी स्थिति जस की तस बनी रहती है। इस बीच मैंने टीवी पर आमिर खान का चर्चित कार्यक्रम सत्यमेव जयते का एक एपिसोड देखा।
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उस एपिसोड में दिल्ली की एक संस्था- ‘आजाद फाउंडेशन’ द्वारा महिलाओं को ड्राइविंग सिखाने की कहानी दिखाई गई थी।आजाद फाउंडेशन के काम को देखते हुए मुझे लगा कि क्यों न ऐसा ही कुछ इंदौर में भी शुरू किया जाए, जिससे उन महिलाओं को आर्थिक सहारा मिल सके, जो किसी वजह से समाज में परेशानी झेल रही हैं। इसके लिए मैंने आजाद फाउंडेशन से संपर्क किया और उन्हें अपनी योजना से अवगत कराया। उम्मीद के मुताबिक, उन्होंने मेरी मदद की और इंदौर आकर मुझे अपने मॉडल के बारे में विस्तार से समझाया। 
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अप्रैल, 2015 में मैंने महिलाओं को ड्राइविंग सिखाने का काम शुरू कर दिया। इसके लिए मैंने उन्हीं महिलाओं से बात की, जिन्हें मैंने अतीत में निःशुल्क न्यायिक मदद दी थी। शुरू में उन्नीस महिलाओं ने झट से मेरी बात मान ली। मैंने उनकी ट्रेनिंग की व्यवस्था की। जब उनका प्रशिक्षण पूरा हो गया, तो उन्हें अलग-अलग सेवाओं के लिए ड्राइविंग की नौकरी भी दिलाई। मेरी सोच थी कि इन लड़कियों को रोजगार की एक ऐसी मुहिम से जोड़ा जाए, जहां ये कुछ अलग काम कर सकें। प्रशिक्षण प्राप्त इन युवतियों को ड्राइवर के रूप में प्लेसमेंट का अभियान हम निरंतर चलाते रहते हैं।

शहर में दूसरी महिलाओं को कहीं जाना होता है, तो वे इन महिला ड्राइवर को कॉल करके बुलाती हैं। अगर किसी महिला को ड्राइविंग सीखनी होती है, तो भी इन्हीं महिला ड्राइवर से गाड़ी सीखना सहज मानती हैं। ड्राइविंग सीखने वाली महिलाओं में चालीस वर्षीय सावित्री भी है, जो इससे पहले दूसरों के घरों में काम करती थी और मुश्किल से महीने के अंत में तीन हजार रुपये कमा पाती थी।


पर अब वह नगर निगम की कचरा गाड़ी चलाती है और पहले से कम घंटों के काम में अच्छे पैसे कमा लेती है। बड़ी कंपनियों के सीएसआर (कॉरपोरेट सामाजिक जिम्मेदारी) और आजाद फाउंडेशन द्वारा मिलने वाली आर्थिक मदद से मैं अब तक करीब सौ महिलाओं को ड्राइविंग सिखा चुका हूं, जिनमें से कुल छब्बीस महिलाएं नियमित रूप से इंदौर की सड़कों पर पेशेवर ड्राइविंग करते हुए देखी जा सकती हैं। मैं चाहता हूं कि अपनी संस्था- समान के माध्यम से महिलाओं को हर उस क्षेत्र में प्रवेश दिला सकूं, जो अभी उनके लिए लगभग वर्जित है।
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