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बिजय दास: एक बच्चा जो भिखारी बना पर 90 साल के शख्स ने बदल दी जिंदगी

Thu, 18 Jan 2018 06:25 PM IST
बिजय दास
बिजय दास Updated Thu, 18 Jan 2018 06:25 PM IST
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when Bijay Das get begging in his childhood
बिजय दास
मैं केवल ग्यारह साल का था। भिखारी बनने का वह मेरा पहला दिन था। पिछले अड़तालीस घंटे से मेरा पेट भोजन के लिए तरस रहा था। अपनी भूख मिटाने के लिए दिन भर भीख मांगने के बाद मुझे एक व्यक्ति से भीख नसीब हुई। भीख पाकर मैं सड़क किनारे बैठकर रोने लगा। उस दिन मैं किसी सामान्य बच्चे की छवि से निकलकर एक भिखारी बन गया था। 
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मुझे ऐसा महसूस हो रहा था कि मेरी कोई अमूल्य चीज मुझसे छीनी जा रही है। मैं उन सारे चेहरों को भूलना चाहता था, जिनसे मैंने पूरे दिन भीख मांगी थी, मगर मैं ऐसा कर न सका। अगले दिन की भूख ने न चाहते हुए मेरे नन्हें हाथों को दूसरों के आगे फैलाने के लिए विवश कर दिया। केवल अगले दिन ही क्यों, कई महीनों तक मेरा यही काम जारी रहा।
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तब तक मैं बच्चा नहीं रह गया था। मसलन बाल मन की सभी आकांक्षाएं मेरे शरीर से प्रवास कर गई थीं। अच्छा महसूस करना क्या होता है, मैं भूलने लगा था। दूसरे लोग भी इसके जिम्मेदार थे। सबके-सब मुझे भिखारी पुकारने लगे थे। बड़ी आसानी से मैंने भी उस सच्चाई को स्वीकार कर लिया था। अपना परिचय भिखारी के तौर पर खुशी-खुशी देने लगा था।
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लेकिन जल्द ही मुझे एक नकली भिखारी बनना पड़ा। दरअसल भीख मांगना मेरी आदत बन चुका था। मैं भीख के पैसों से ही खुश रहना सीख गया था और कभी-कभार हंसते हुए ही लोगों से भीख मांगता। लेकिन मेरा प्राकृतिक स्वभाव किसी को भीख देने के लिए प्रेरित ही नहीं करता। कोई भीख देना भी चाहता, तो मेरी मुस्कराहट देखकर हाथ पीछे कर लेता। 

छोटी-सी उम्र में ही मैं समझ गया कि दुनिया कितनी नकली है। मैंने भीख मांगते वक्त दुखी चेहरा बनाना सीख लिया। जिससे भीख मांगता, उसका चेहरा भी नहीं देखता, केवल अपने पैर देखता रहता। मगर मैं इतना बड़ा कलाप्रेमी था नहीं, जो इस अभिनय को झेल सकूं। झूठे चेहरे के कारण मैं हर दिन बुरा महसूस करता।

when Bijay Das get begging in his childhood
बिजय दास
फिर भी मरता क्या न करता, कोई दूसरा काम भी तो नहीं था। जिस इलाके में मैं भीख मांगता था, वहीं पास में कासिम नाम के एक बूढ़े मोची भी बैठते थे। नब्बे वर्ष की उम्र रही होगी उनकी। मैं देखता रहता था कि बिना दांतों के भी वह हंसते हुए अच्छे लगते थे।

न जाने कितने दिन बीत गए होंगे, मैं ऐसा हंसा नहीं, यही सब सोचकर एक सुबह मैं उनके पास गया, उनसे पूछा कि इस उम्र में दूसरों के जूते पॉलिश करने का काम आपको खराब नहीं लगता? कासिम मुझे देखकर मुस्कराया, लेकिन उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। उन्होंने बस इतना कहा कि मुझे उनसे काम सीखना चाहिए। 

मैं अवाक-सा हो गया और मोची बनने के उनके प्रस्ताव को नकारते हुए लगभग नाराज होकर वापस आ गया। लेकिन उसी शाम मैं उनके पास फिर गया। मैंने उनसे काम सीखना शुरू कर दिया। उन्होंने मुझे काम करने के लिए अपना सामान भी दिया। पर काम के पहले ही दिन मैं बीमार पड़ गया। मैं अपने नए काम से डरा हुआ था। 

कासिम मियां ने मेरा हाथ अपने हाथों में लेकर मुझसे कहा- 'बिजय, अगर तुम ईमानदारी से अच्छा काम करोगे, तो तुम कभी बुरा महसूस नहीं करोगे, तुम्हें हमेशा अच्छा लगेगा। अगर तुम गलत महसूस करते हो, तो इसका मतलब तुम कुछ न कुछ गलत कर रहे हो।' जिंदगी के पिछले 44 वर्षों में मैंने गरीबी देखी, भूखा सोया, पर फिर कभी बुरा महसूस नहीं किया, कभी गलत साबित नहीं हुआ।

-बांग्लादेश में रहने वाले बिजय दास के विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।
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