'मेरा मकसद लोगों को प्लास्टिक के बारे में जागरूक करना है, जिससे पर्यावरण को नुकसान न पहुंचे'
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
गाहे-बगाहे यह खबर निश्चित अंतराल के बाद कानों में सुनाई देती रहती है कि कर्ज के तले दबकर किसान ने आत्महत्या कर ली। ये ऐसी खबरें हैं, जिनसे औरों की तरह मैं भी परेशान हो जाती हूं। क्योंकि मैं मानती हूं कि वह व्यक्ति, जिसकी बदौलत हमारी दैनिक जरूरतें पूरी होती हैं, यदि अपनी बुनियादी आवश्यकता पूरी नहीं कर पाता और अपने जीवन से इस तरह से हार जाता है, तो इसका तात्पर्य है कि समाज में कहीं न कहीं एक बड़ा अंतर मौजूद है, जिसे जल्द से जल्द भरा जाना चाहिए।
चार साल पहले तक मैं बंगलूरू की कॉरपोरेट दुनिया में एक चार्टर्ड एकांउटेंट के तौर पर काम कर रही थी। एक दिन मैंने सोचा कि किसानों की समस्याओं पर केवल चर्चा करने से कुछ नहीं होगा, बल्कि उनके लिए वास्तव में कुछ न कुछ करना होगा। मैं रातोंरात सब कुछ नहीं बदल सकती थी, इसलिए मैंने एक छोटी शुरुआत की। दरअसल मेरे दिमाग में एक ऐसा विचार था, जिसमें जैविक खेती के जरिये किसानों, उपभोक्ताओं और पर्यावरण, सबकी बेहतरी शामिल थी।
मैंने जोखिम उठाते हुए अपना पेशा बदल लिया। अब मैं कोई सीए नहीं, बल्कि किसानों के साथ काम करने वाली सामान्य महिला की भूमिका निभाने की तैयारी में थी। मैंने अपनी परियोजना का नाम दिया बफैलो बैक कलेक्टिव, जिसमें शामिल थी ग्रामीण अनुभव के आधार पर शहरी जरूरतों की पूर्ति। यह एक ऐसा मंच था, जहां कोई पदानुक्रम नहीं था और हर कोई अपने काम का मालिक।
स्वयं सहायता और सहकारिता के मॉडल में मैंने कुछ छोटे किसानों को अपने साथ लिया। हर किसान को उत्पादन से लेकर विपणन तक की जिम्मेदारी खुद निभानी थी। मेरा काम यह था कि इस प्रकिया में सब कुछ टिकाऊ, स्थानीय और उपयोगी हो, मतलब फसल से जुड़ी हर चीज का प्रयोग हो। इसके अलावा मैंने किसानों को नियमित स्तर पर प्रशिक्षण दिया, जिसमें खेती से जुड़ी नवीनतम तकनीकी ज्ञान शामिल था। मैं शहरी जरूरतों को बेहतर तरीके से समझती थी।
मुझे पता था कि शहरी लोग देसी चीजों को इतनी आसानी से स्वीकार नहीं करेंगे, इसलिए मैंने अनेक कृषि उत्पादों को इस तरह से तैयार कराया, जो लोगों को आकर्षक लगें। कुछ ऐसे बाई प्रोडक्ट्स को, जिन्हें किसान बेकार समझ कर बहुत कम मूल्य पर बेच देते, मैंने अपनी योजनाओं से नई कीमत प्रदान की। इस तरह बहुत कम समय में हमने बफैलो बैक कलेक्टिव के माध्यम से खासी सफलता हासिल कर ली। अच्छी बात यह रही कि इस काम से जुड़े किसानों को ही फायदा नहीं हुआ, बल्कि उपभोक्ताओं को भी उत्पादों की शुद्धता का लाभ मिला। मैंने रूट्स टू ग्रेन्स नाम से एक अभियान भी चलाया, जिसका मकसद लोगों को यह समझाना था कि वे अपने घरों के पीछे की जमीन पर कुछ न कुछ उगा सकते हैं।
मेरे पूरे कार्यक्रम की एक और खासियत है। हम अपने काम में प्लास्टिक का इस्तेमाल बिल्कुल नहीं करते। हमारी संस्था के सभी सदस्य अपने उत्पादों को हस्तनिर्मित टोकरियों, झोलों या लिफाफों में रखकर क्रेता तक पहुंचाते हैं। इस पहल के पीछे हमारा मकसद लोगों को प्लास्टिक के विभिन्न विकल्पों के बारे में शिक्षित करना है, जो पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं पहुंचाते हैं। हमारी पहल के कारण यदि एक व्यक्ति भी किराने की दुकान पर प्लास्टिक की थैली नहीं मांगता है, तो यह देखकर मुझे संतुष्टि मिलती है।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।