आदिवासी बस्तियों में मिट्टी के घरों पर विशेष चित्रकारी को दिलाई पहचान, कई कलाकारों को मिला रोजगार
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बचपन में मैंने एक किताब पढ़ी थी, जिसमें जिंदगी में कुछ अलग करने पर जोर देने वाली बातें लिखी थीं। लेकिन अलग करना तो दूर, मैं जब आठवीं कक्षा में था, तब पूरी तैयारी करने के बावजूद मंच पर मेरे मुंह से एक शब्द नहीं निकला था। मैं पढ़ने में होशियार था, पर लोगों का सामना कर पाना मेरे लिए मुश्किल था। यही वजह रही कि एनआईटी, कुरुक्षेत्र से इंजीनियरिंग करते हुए, जब आर्ट ऑफ लिविंग संस्था से जुड़े कुछ लोगों ने मुझे ध्यान और अन्य अभ्यासों की मदद से मेरा संकोच खत्म करने का लालच दिया, तो मैंने तुरंत हां कर दी।
मेरी इंजीनियरिंग एजुकेशन लोन के कारण संभव हो सकी थी। इंजीनियरिंग करते हुए मैं ध्यान आदि से जुड़ा ही, साथ ही कॉलेज में संचालित होने वाले आंत्रप्रेन्योरशिप डेवलेपमेंट सेल से भी जुड़ा रहा। आर्ट ऑफ लिविंग ने मेरे मन में समाज के लिए कुछ करने के बीज बो दिए, तो उद्यमिता की कक्षाओं ने मुझे कुछ करने का हौसला दिया। इन दोनों चीजों का ही परिणाम था कि मैं सामाजिक उद्यमिता के बारे में सोचने लगा।
पारिवारिक अपेक्षाओं को ध्यान में रखते हुए मैंने पढ़ाई पूरी करते ही नोएडा की एक कंपनी में नौकरी शुरू कर दी। सोचा था कि दो-तीन साल नौकरी करके कर्ज चुका दूंगा। पर दो-तीन महीने में ही नौकरी से मेरा मोह भंग हो गया। मुझे जमशेदपुर में अपने पिता का स्कूल संभालने वाले अपने दोस्त की बातें याद आतीं, जो उसने काफी पहले ही मुझसे कही थीं। हमने तय किया था कि हम पढ़ाई पूरी करने के बाद स्कूल में गरीब बच्चों के लिए 'हॉबी क्लासेस' संचालित करेंगे।
चंद महीनों में ही मैं नौकरी के दबाव के कारण अवसाद में रहने लगा। एक शुभचिंतक की सलाह पर मैंने दोबारा ध्यान की कक्षाएं लेनी शुरू कीं। बेहतर महसूस करते ही मैंने नौकरी छोड़ने का फैसला किया। घर वाले मेरे फैसले के खिलाफ थे, मगर नौकरी कर पाना मेरे लिस असंभव-सा हो गया था। मैंने अपने उसी दोस्त से कहा कि मैं आ रहा हूं हॉबी क्लासेस शुरू करने। वापस लौटकर मैंने बच्चों को पढ़ाना शुरू किया। एक दिन ऐसे ही मैं शहर के बाहरी इलाकों में घूम रहा था। मैंने देखा कि आदिवासी बस्तियों में मिट्टी के घरों पर विशेष चित्रकारी की गई है। जिज्ञासा बढ़ी, तो पता लगा कि विलुप्त होते मिट्टी के घरों के साथ ये लोक कलाएं भी तेजी से गायब होती जा रही हैं।
मेरे लिए सामाजिक उद्यमशीलता के लिए इससे बेहतर अवसर और क्या हो सकता था! मैंने इस क्षेत्र में शोध करना शुरू कर दिया। पता चला कि हजारीबाग के इलाकों में ये कलाएं बहुतायात में देखी जा सकती हैं। मैंने अपने इलाके में इस विरासत को बचाने के लिए और इन कलाओं से जुड़े लोगों को आर्थिक रूप से सशक्त करने के इरादे से ‘माटी का घर’ नाम से एक संस्था की शुरुआत की। यह नाम भी इसलिए रखा, क्योंकि ये कलाकृतियां मिट्टी के इस्तेमाल से मिट्टी के घर पर ही उकेरी जाती थीं।
पिछले एक साल से मैं इसी काम से जुड़ा हूं और ग्राहकों की मांग के मुताबिक करीब दर्जन भर कलाकारों को रोजगार मुहैया करा रहा हूं। मांग न भी हो, तो भी मैं इनके प्रोत्साहन के लिए उत्पाद खुद खरीद लेता हूं। साथ ही जिन बच्चों को मैं पढ़ाता हूं, मैंने उनके मन में भी लोक कलाओं के प्रति अनुराग पैदा किया है। मेरा उद्यम हाइब्रिड मॉडल पर काम करता है, जिसमें लोगों को प्रशिक्षण जैसी चीजें गैर लाभकारी, तो कुछ चीजें राजस्व जुटाने से जुड़ी होती हैं, क्योंकि बगैर साधनों के किसी की भी मदद नहीं की जा सकती।