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'बेघर बच्चों की मां बनने में मुझे कई चुनौतियों का भी सामना करना पड़ा, इनकी सेवा मेरे जीवन का मकसद'

Mon, 14 May 2018 04:19 PM IST
तुलसी परिहार
तुलसी परिहार Updated Mon, 14 May 2018 04:19 PM IST
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Tulsi Parihar- Incredible Woman Who has Raised 33 Children, Longest serving SOS Mother
Tulsi Parihar

उत्तराखंड के नैनीताल जिले की एक सैन्य पृष्ठभूमि वाले परिवार में जन्म लेने के बाद मात्र उन्नीस वर्ष की उम्र में मेरी शादी कर दी गई। जल्द शादी होने के कारण मुझे पर्याप्त शिक्षा हासिल करने का मौका नहीं मिला। शादी के बाद तीन वर्ष तक सब कुछ ठीक-ठाक सामान्य तरीके से चलता रहा। फिर दुर्भाग्य से मेरे पति की मृत्यु हो गई। मेरे ससुराल वालों ने मुझे आगे सहारा देने से मना कर दिया, जिस कारण मजबूरीवश मुझे एक साल की अपनी संतान के साथ मायके लौटना पड़ा।

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मुझे अच्छी तरह से पता था कि पति की मौत के बाद मेरी जिंदगी पूरी तरह बदल चुकी है। उस वक्त मेरे परिवार वालों की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी। ऐसे में मुझे लगा कि घरवालों पर बोझ बनने के बजाय मुझे भी कोई काम ढूंढ लेना चाहिए। यह वाकया तीन दशक से भी पहले का है। काम पाने की मेरी तलाश एक ऐसी संस्था पर जाकर खत्म हुई, जो उन बच्चों का भविष्य संवारने का काम करती थी, जिन्हें अपने मां-बाप का स्नेह नहीं मिलता।
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एसओएस चिल्ड्रेन विलेज नाम की इस संस्था के बारे में मुझे एक जानने वाले ने बताया था। जब मैं एसओएस चिल्ड्रेन विलेज पहुंची, तब मुझे एहसास हुआ कि मुझे बेघर बच्चों की मां के तौर पर काम करना है। मुझे काम की तलाश थी और इस काम से बेहतर मेरे लिए और क्या हो सकता था! मुझे इतना सम्मानजनक और सुरक्षित काम किसी दूसरी जगह शायद ही मिलता, मैंने तुरंत हां कर दी। प्रशिक्षण के बाद मैंने नैनीताल के पास भीमताल के एसओएस चिल्ड्रेन विलेज में काम करना शुरू कर दिया।

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उस दिन के बाद मैंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। बच्चों की सेवा को जीवन का मकसद बनाते हुए अपने का काम को मैं पूरे मनोयोग से से करती रही। सच कहूं, तो इतने शानदार काम के लिए मुझे ईश्वर का धन्यवाद करना चाहिए।

तब से लेकर अब तक मैंने कुल तैंतीस बच्चों को पाल-पोसकर बड़ा किया है। यह संख्या किसी भी बड़े से बड़े परिवार से बड़ी है। और सबसे खास बात यह कि बावजूद इसके मुझे प्रत्येक बच्चे से जुड़ी सारी चीजें याद हैं। मसलन, उन्हें क्या पसंद है, वे क्या करना चाहते हैं, सब कुछ। जैसे एक मां को अपने बच्चों के बारे में पता होता है। फिलहाल मेरे साथ केवल दस बच्चे ही बचे हैं, क्योंकि उनमें से कुछ बच्चे उच्च शिक्षा के लिए छात्रावास वगैरह में रह रहे हैं और बाकी पंद्रह अपने जीवन में सुनियोजित हो चुके हैं। इन पंद्रह में कुछ लड़कियां और लड़कों ने शादी भी कर ली है।

बेघर बच्चों की मां बनने की प्रकिया में मुझे हालांकि कई चुनौतियों का भी सामना करना पड़ा। कुछ बच्चों को अपने परिवार में शामिल कर उनके साथा बाकियों का तालमेल बिठाने में बहुत मशक्कत करनी पड़ी। दो-चार सदस्यों के परिवार में भी मतभेद सामान्य है, मझे तो तैंतीस बच्चों को संभालना था। यह सब संभव हो सका संस्था द्वारा आयोजित किए जाने वाले विभिन्न प्रशिक्षण कार्यक्रम और अपनी मजबूत इच्छाशक्ति के बदौलत। मुझे विदेश जाकर दुनिया भर में काम करने वाली मेरी जैसी दूसरी मांओं से मिलने का भी मौका मिला। मेरे लिए यह बहुत बड़ी बात थी, पर दर्जनों बच्चों की मां बनने से बड़ी नहीं।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।

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