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उम्र से आजाद है कुछ नया करने की ख्वाहिश: 8वीं कक्षा के बच्चे ने खड़ी की लॉजिस्टिक्स कंपनी

Sun, 22 Jul 2018 03:35 PM IST
तिलक मेहता
तिलक मेहता Updated Sun, 22 Jul 2018 03:35 PM IST
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Tilak Mehta -13 Year Old boy founder of Papers N Parcels app for a logistics start up
तिलक मेहता

चार बजे तक मैं स्कूल में रहता हूं। घर लौटते ही तुरंत दफ्तर जाता हूं। छुट्टी के दिनों में दिन के पहले हिस्से मैं अपनी टीम के साथ मीटिंग करता हूं और दूसरे हिस्से यानी शाम के वक्त दोस्तों के साथ खेलता हूं। उस दिन मैं अपनी कुछ किताबें भूलवश एक अंकल के घर में छोड़ आया था। उनका घर मेरे घर से दूर शहर के दूसरे हिस्से में था। मैं जब घर आया, तो मुझे उन किताबों का ख्याल आया। उस वक्त मुझे उनकी जरूरत थी।

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काम करके पापा घर लौट चुके थे। किसी भी काम की तरह पहले तो यही सोचा कि पापा से बोल दूं कि वह मेरी किताबें ले आएं, मगर उनको थका-हारा देख उनसे कुछ कहने की हिम्मत नहीं हुई। मन में इच्छा हुई कि काश! कोई ऐसी सुविधा होती, जिससे वे किताबें तुरंत ही मेरे पास आ जाएं। अगले कुछ दिनों में वे किताबें मुझे मिल गईं। लेकिन जब तक वे किताबें मेरे पास नहीं आईं, मेरे दिमाग में एक किसी तेज कुरियर सेवा का विचार घूमता रहा। एक दिन मैंने अपनी बिल्डिंग में एक डिब्बेवाले को देखा।
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मैं इन डिब्बावालों को अच्छी तरह से जानता था कि ये तय वक्त पर शहर के किसी भी कोने में हर रोज सबका खाना पहुंचाते हैं, जिसके लिए इनका समृद्ध नेटवर्क काम करता है। मैंने सोचा, क्यों न इन डिब्बावालों को खाना के अलावा दूसरी चीजें भी डिलीवरी करनी चाहिए! खासकर कोई जरूरी कागजात या फिर किताबें आदि। इससे लोगों का जीवन तो आसान होगा ही, साथ ही डिब्बावालों की आय में भी बढ़ोतरी होगी।

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Tilak Mehta -13 Year Old boy founder of Papers N Parcels app for a logistics start up

मैंने यह विचार अपने पापा से साझा किया, जो कि खुद एक बड़ी लॉजिस्टिक्स कंपनी में अच्छे पद पर कार्यरत हैं। आठवीं कक्षा में पढ़ने वाले तेरह साल के अपने बेटे की किसी दिमागी खुराफात पर एक बार में तो उन्होंने कोई खास ध्यान नहीं दिया। लेकिन कुछ समय बाद जब मैंने उन्हें इस काम के लिए किए गए अपने शोध और पूरी योजना बताई, तो वह मेरी मदद करने के लिए तैयार हो गए। मैंने एक बैंक अधिकारी से भी अपनी योजना साझा की। उन्हें मेरी बातें इतनी पसंद आईं कि उन्होंने अपनी नौकरी छोड़ दी और मेरे साथ योजना को मूर्त रूप देने में जुट गए। जल्द ही 'पेपर एंड पार्सल' नाम से हमारा मोबाइल ऐप तैयार हो गया।

इसी ऐप की मदद से हम लोगों के कागज-पत्र आदि डब्बावालों के माध्यम से विभिन्न पतों पर पहुंचाने वाले थे। चार महीनों तक हमने ट्रायल के तौर पर इस सेवा को जांचा-परखा। सब कुछ ठीक मिलने पर पिछले दिनों मैंने इस सेवा की आधिकारिक शुरुआत कर दी। मैंने तीन सौ से ज्यादा डिब्बावालों को अपने नेटवर्क से जोड़ा है। फिलहाल हमें हर रोज हजार से ज्यादा डिलीवरी ऑर्डर मिल रहे हैं।

डिब्बेवालों को खाना पहुंचाने के अपने मूल काम में कोई दिक्कत न आए, इसके लिए मैंने पार्सल का अधिकतम भार तीन किलो तय किया है। डिब्बावालों के नेटवर्क का इस्तेमाल करके हम बेहद कम कीमत पर अपने आप में विश्वस्तरीय लॉजिस्टिक्स सेवा प्रदान कर रहे हैं। मेरी सेवाएं लेने वालों में ज्यादातर लोग पैथोलॉजी लैब, बुटीक और ब्रोकरेज कंपनी वाले होते हैं। भले ही मैं अभी बहुत छोटा हूं, पर मेरा लक्ष्य अगले दो वर्षों में कंपनी को नई ऊंचाई पर ले जाना है। मुझे सूरत के एक विश्वविद्यालय से बुलावा आया है। पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि वहां के बिजनेस स्टूडेंट्स को अपनी कहानी सुनाने के लिए।

-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।

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