'किशोरों में शिक्षा की अलख जगाने के लिए मुझे स्कूली बस का ड्राइवर बनना भी मंजूर'
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कर्नाटक के उडुपी जिले में स्थित है बराली राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय और मैं इस विद्यालय में शारीरिक शिक्षा का अध्यापक हूं। पिछले कई वर्षों से मैं देख रहा था कि हर नए सत्र में हमारे स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों की संख्या बढ़ने के बजाय घट रही थी। मैंने वजह तलाशने की कोशिश की, तो पता चला कि अभिभावक अपने बच्चों को उन स्कूलों में भेजने में रुचि ले रहे थे, जहां बस की सुविधा थी। अब भला मेरे सरकारी स्कूल में बस कहां से आती! मुझे विद्यार्थियों की घटती संख्या परेशान करने लगी। मैं सोचने लगा कि कैसे प्राइवेट स्कूलों को टक्कर देकर बच्चों को अपने स्कूल में लाया जाए।
वैसे हमारे विद्यालय में सिर्फ एक बच्चा भी पढ़ता, तो भी मुझे सरकार की ओर से पूरा वेतन मिलता। मगर मैं न इतना स्वार्थी हूं, और न ही सामाजिक सरोकारों से मुंह छिपाने वाला शख्स। मैंने यह समस्या अपने स्कूल के कुछ पुराने विद्यार्थियों से साझा की। अपने पूर्व स्कूल से भावनात्मक जुड़ाव के नाते उन लोगों को भी लगा कि स्कूल के लिए कुछ करना चाहिए। इन पुरातन छात्रों में वे लोग भी शामिल थे, जो वर्तमान में अलग-अलग क्षेत्र में अच्छे पदों पर काम कर रहे थे। आखिरकार अपने स्कूल के लिए हम सबने मिलकर पिछले साल एक मिनी बस खरीद ली।
'हाथी खरीदना आसान है, लेकिन उसे पालना मुश्किल।' यह कहावत जैसे हमारे लिए ही बनी थी। बस तो खरीद ली, मगर उसके रखरखाव और लगातार होने वाले दूसरे तरह के खर्च प्रबंधित कर पाना हमारे लिए नई चुनौती था। बस के लिए ड्राइवर का इंतजाम कर पाना तो और भी मुश्किल था। बच्चों की सुरक्षा के मद्देनजर हमारे लिए जरूरी था कि बस किसी कुशल ड्राइवर के जिम्मे की जाए और इस निश्चिंतता की कीमत थी कम से कम दस हजार रुपये महीने की तनख्वाह वाला ड्राइवर।
बाकियों का तो नहीं, पर यह खर्च बचाने के लिए मैंने सोचा कि बस का ड्राइवर मैं ही बन जाऊं, तो क्या बुरा है! पैसे भी बचेंगे और बच्चों की सुरक्षा का जिम्मा भी अपने हाथ में रहेगा। और इस तरह मैं शिक्षक के साथ स्कूल बस ड्राइवर की दोहरी भूमिका में आ गया। कमाल देखिए, मात्र बस की सुविधा होते ही हमारे स्कूल में बच्चों की संख्या साठ से बढ़कर नब्बे तक पहुंच गई।
अतिरिक्त काम की वजह से मेरी दिनचर्या थोड़ी-सी बदल गई। मुझे सुबह घर से करीब डेढ़ घंटे पहले निकलना पड़ता है। मेरे स्कूल में हर दिन बच्चों की संख्या नब्बे ही रहे इसके लिए दिनभर में मुझे कुल साठ किलोमीटर बस चलानी पड़ती है, क्योंकि ज्यादातर बच्चे देहाती इलाकों में रहते हैं। मैं बस के ईंधन का खर्च खुद वहन करता हूं, हालांकि मुझे इस बात की फिक्र नहीं है।
हां, मेरी एक चिंता जरूर है और वह है कि यदि मेरा स्थानांतरण किसी दूसरे विद्यालय में कर दिया गया, तो क्या होगा? मैं कोशिश में हूं कि इसी वर्ष आयोजित होने वाले हीरक जयंती कार्यक्रम में पूर्व छात्रों की बैठक में कोई समाधान जरूर निकाला जाए कि मेरे न रहने पर भी बस के चक्के न थमें। किसी जरूरी काम से यदि मैं एकाध दिन का अवकाश भी लेता हूं, तो उससे पहले ही यह सुनिश्चित करके छुट्टी पर जाता हूं कि स्कूल बस सेवा प्रभावित न हो।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।