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'मेरा उद्देश्य मछुआरों के बीच कछुओं को लेकर जागरूकता फैलाना है'

Fri, 01 Jun 2018 03:32 PM IST
सुप्रजा धारिणी
सुप्रजा धारिणी Updated Fri, 01 Jun 2018 03:32 PM IST
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Supraja Dharini- Chairperson TREE Foundation, working for Conservation of sea turtles and dolphins
Dr.Supraja Dharini

यह घटना करीब सत्तरह साल पहले की है। उस दिन मैं यों ही समुद्री किनारों को निहारने गई हुई थी। मैंने वहां एक मरा हुआ कछुआ देखा। स्थानीय मछुआरों से बात करने पर पता चला कि कछुआ मोटर से चलने वाली नाव की चपेट में आकर मरा है। यही नहीं, कई मर्तबा मुछआरों द्वारा मछली पकड़ने के लिए डाले गए जाल में फंसकर भी कछुए मुश्किल में पड़ जाते हैं। मुझे यह जानकर बहुत दुख हुआ। मैंने उसी दिन तय कर लिया था कि मैं कछुओं को इस तरह मरने से बचाने के लिए हर संभव प्रयास करूंगी।

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मैं चेन्नई में काम करने वाली संस्था-ट्री फांउडेशन (ट्रस्ट फॉर एन्वायरमेंटल एजुकेशन, कंजर्वेशन ऐंड कम्युनिटी डेवलपमेंट) की संस्थापिका हूं। मैं भले ही फिलहाल पर्यावरण से संबंधित काम कर रही हूं, लेकिन मैंने स्नातक कॉमर्स विषय से किया था। बाद में मैंने दर्शनशास्त्र से एमए और पीएच डी भी पूरी की। मन में कछुओं के प्रति लगाव पैदा होने के बाद मैंने उनका व्यवहार और बेहतर तरीके से समझने के लिए 2008 में अमेरिका की ड्यूक मरीन यूनिवर्सिटी से सी टर्टल बायोलॉजी विषय से पोस्ट ग्रेजुएट कोर्स भी किया।
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2002 में ट्री फांउडेशन संस्था की स्थापना का मेरा उद्देश्य था कि मछुआरों के बीच कछुओं को लेकर जागरूकता फैलाई जाए। उन्हें बताया जाए कि कछुए हमारे पारिस्थितिकी तंत्र के लिए कितने आवश्यक हैं। जागरूकता की प्रकिया में मछुआरों को कछुओं के अंडों की रक्षा करने के बारे में बताना भी शामिल था। इस काम के लिए मैंने शुरुआत में पांच गांवों में काम किया, जो कुल तेरह किलोमीटर की समुद्री सीमा साझा करते थे।

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अमेरिकी पढ़ाई पूरी करने के बाद मैंने अपने काम का दायरा पच्चीस गांवों तक बढ़ा दिया। मैंने मछुआरों को अपने साथ लेकर एक विशेष बल-सी टर्टल प्रोटेक्शन टास्क फोर्स का भी गठन किया, जिसका काम था, कछुओं के प्रजनन काल के दौरान समुद्री किनारों पर दिन-रात निगरानी रखना।

दस साल से भी ज्यादा के मेरे इस विशेष सफर का नतीजा है कि आज लाखों की संख्या में कछुओं के बच्चे अपने घर यानी समुद्र में सुरक्षित छोड़े जा चुके हैं। मौजूदा वक्त में हमारा अभियान तमिलनाडु की सीमा पार करके आंध्र प्रदेश और ओडिशा तक पहुंच चुका है, जहां हम सैकड़ों किलोमीटर लंबे समुद्री तटों पर काम कर रहे हैं। 2010 से ही हमारी संस्था आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु सरकार के वन्य जीव विभाग के साथ मिलकर काम कर रही है।

मैं समय-समय पर स्कूली बच्चों के बीच 'फ्लिपर टेस्ट' भी आयोजित करती हूं। अब तक करीब दो लाख स्कूली बच्चों तक पहुंच रखने वाले इस कार्यक्रम में पेंटिंग, क्विज, नाटक, डॉक्यूमेंटरी आदि के माध्यम से उन्हें अपनी जैव विविधता की अहमियत से अवगत कराते हैं। इसके अलावा हमने करीब पांच हजार मछुआरों को प्रशिक्षित करके अपने शोध के आधार पर उन्हें वह तकनीक मुहैया कराई है, जो उनके जाल में कछुओं को फंसने से रोकती है।

एक लंबे वक्त तक काम करने के बावजूद हमारे काम को बहुत ज्यादा महत्व नहीं दिया गया, लेकिन बाद में कई लोगों ने इस काम की अहमियत समझी। जब मैंने पहली बार अपने इस अनोखे कार्यक्रम की शुरुआत की थी, तब मुझे बिलकुल भी अंदाजा नहीं था कि मेरी कोशिशों का इतना शानदार फल मिलेगा। लेकिन अब मैं अपने अनुभव के आधार पर यह कह सकती हूं कि इंसान अगर ठान ले, तो कुछ भी असंभव नहीं है।

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