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शोर-शराबा स्वास्थ्य के लिए घातक बीमारी है, इसी के खिलाफ कारगर आवाज उठा रही हैं सुमैरा

Tue, 10 Apr 2018 01:44 AM IST
सुमैरा अब्दुलाली
सुमैरा अब्दुलाली Updated Tue, 10 Apr 2018 01:44 AM IST
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Sumaira Abdulali- environmentalist from Mumbai, founder of NGO Awaaz Foundation
Sumaira Abdulali

मेरे एक परिचित शख्स उस समिति का हिस्सा थे, जो उच्च न्यायालय द्वारा गठित की गई थी। मुंबई का ध्वनि प्रदूषण कम करने के लिए सुझाव देना उस समिति का काम था। वह एक मैरिज हॉल के पास अपना काम कर रहे थे। रिपोर्ट टाइप करने में उन्हें मेरी जरूरत पड़ी। उनकी रिपोर्ट टाइप करते हुए मुझे पहली बार ध्वनि प्रदूषण की भयावहता का पता चला। एक जानकारी में इतनी ताकत थी कि उसके बाद हर रोज शहर का शोर-शराबा मुझे परेशान करने लगा।

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करीब दो साल बाद 2002 में मैं अपने उन्हीं परिचित के साथ ध्वनि प्रदूषण कम करने की दिशा में काम करने लगी। उनकी कानूनी जानकारी का लाभ लेते हुए सबसे पहले मैंने अदालत में जनहित याचिका दायर करके शहर के कुछ इलाकों को शांत क्षेत्र घोषित कराने में अदालती सफलता हासिल की। जब मेरा पहला ही प्रयास प्रभावशाली रहा, तो मुझे कई लोगों ने बधाई के साथ शोर से होने वाली खुद की परेशानियों से अवगत कराया।
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मैं उनके लिए काम करने को तैयार तो थी, पर समस्या की व्यापकता को देखते हुए लगा कि मुझे इस काम के लिए एक औपचारिक ढांचा बनाना होगा। परिणाम स्वरूप 2006 में आवाज फाउंडेशन की शुरुआत हो गई। यह संस्था मेरे द्वारा पिछले चार वर्षों से मुंबई में ध्वनि प्रदूषण के खिलाफ चलाए जा रहे विभिन्न अभियानों का संगठित रूप थी। भारत जैसे देश में कोई भी कार्यक्रम बिना गाजे-बाजे के नहीं आयोजित होता। धार्मिक पर्व-त्योहार भी ध्वनि प्रदूषण के बड़े कारक हैं। मैं शहर के विभिन्न समुदायों में जाकर उनसे ध्वनि प्रदूषण के बारे में बात करने लगी।

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Sumaira Abdulali- environmentalist from Mumbai, founder of NGO Awaaz Foundation
Sumaira Abdulali

उनसे बात करने पर मुझे पता चला कि वे सभी शोर से परेशान हैं और बदलाव चाहते हैं, लेकिन वे इसलिए चुप हैं, क्योंकि इस शोर के पीछे बहुत प्रभावशाली लोग होते हैं। और धर्म आदि के मामले में कौन टांग अड़ाए! मुझे समझ में आ गया कि बिना जोखिम लिए कोई बदलाव नहीं आ सकता, और उसके लिए भी जरूरी है कि सरकार द्वारा बनाए गए कानूनी प्रावधानों पर अमल हो। जनहित याचिका का सही प्रयोग करना मुझे आता था। 2009 में उच्च न्यायालय ने मेरी ऐसी ही एक याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार को ध्वनि प्रदूषण को लेकर कड़े निर्देश दिए।

हमारी संस्था के काम का असर दिखने लगा था। दरअसल आवाज पहली ऐसी संस्था थी, जिसने भारत में ध्वनि प्रदूषण को लेकर डाटा इकट्ठा किया था। तब से लेकर आज तक मैं अदालत के अलावा अनेक रचनात्मक तरीकों से लोगों को ध्वनि प्रदूषण के खिलाफ जागरूक करती रहती हूं। कई लोग मुझे यह समझते हैं कि मैं उत्सवों के रंग में भंग डालने वाली कार्यकर्ता हूं। कुछ लोग मेरे काम में धार्मिक कोण भी निकाल लेते हैं, मगर मुझे अपना काम पता है।

मैं जानती हूं कि त्योहार खुशियों के लिए होते हैं और शोर-शराबा स्वास्थ्य के लिए घातक बीमारी है, जिसका उत्सव से कोई लेना-देना नहीं। मैं इसी बीमारी को मिटाने में जुटी हूं। लोगों को जागरूक करने के लिए मैं मुंबई की सड़कों पर एक विशेष ऑटोरिक्शा संचालित कराती हूं, जिसकी बॉडी पर सैकड़ों हॉर्न लगाए गए हैं। ये हॉर्न लोगों का ध्यान इस तरफ ले जाते हैं कि सड़कों पर हॉर्न का किस तरह बेजा इस्तेमाल किया जाता है। इस ऑटो पर 'हॉर्न नॉट ओके प्लीज' लिखा है। साथ ही मैंने रेत खनन माफियाओं के विरुद्ध भी अपनी मुहिम छेड़ रखी है।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।

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