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'मुझे उस दिन का इंतजार है, जब मेरे किताब को पढ़कर लोग धूम्रपान छोड़ने के लिए विवश हो जाएंगे'

Tue, 31 Jul 2018 12:50 PM IST
सुकृति नाथ
सुकृति नाथ Updated Tue, 31 Jul 2018 12:50 PM IST
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Sukkriti Nath- 16 years old author of fiction novel The Burning Truth

किसी सामान्य किशोरी की तरह मेरा भी सोशल मीडिया पर एक दायरा है। मैं भी दूसरी लड़कियों की ही तरह फिल्में देखती हूं, लेकिन उनकी तरह मैं भी असमंजस में हूं कि जिंदगी में क्या करना सबसे बेहतर होगा! मेरी उम्र सोलह साल है और मैं दिल्ली से सटे गुरुग्राम में रहती हूं। मैं उस परिवार से आती हूं, जिसकी जड़ें बनारस में हैं। मेरे घर के कई सदस्यों का साहित्य से गहरा लगाव रहा है। यही वजह रही है कि मैं हमेशा से ही पढ़ने-लिखने की शौकीन रही हूं। मुझे स्कूल में एक प्रोजेक्ट दिया गया था, जिसके तहत मुझे साढ़े तीन हजार शब्दों की एक रिपोर्ट तैयार करनी थी। छह महीने के वक्त में मुझे वह रिपोर्ट अपने सबसे दिलचस्प विषय पर लिखनी थी। रिपोर्ट किस विषय पर लिखी जाए, इसके लिए मैं कई दिनों से परेशान थी।

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उस दिन मेरे दादा जी ने मुझे किसी काम के लिए अपने कमरे से पुकारा। 'बाबा, मुझे परेशान मत करिए, मैं व्यस्त हूं', मैंने जवाब दिया। मैं अपने स्कूल के प्रोजेक्ट में व्यस्त थी। अगले दिन वह बनारस निकल गए और फिर कभी लौटकर नहीं आए। दरअसल वह कैंसर के मरीज थे। तंबाकू ने उनकी जान ले ली। मैंने उन्हें कई बार मना किया था। यहां तक कि मैं जब भी उन्हें तंबाकू का सेवन करते पकड़ती, उन्हें दंड स्वरूप मेरे गुल्लक में पैसे डालने पड़ते।
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उनके जाने के बाद मुझे ध्यान आया कि मेरे नाना भी तो ऐसा ही करते हैं। दादा को खोने के बाद मैं नाना को खोना नहीं चाहती थी। तंबाकू छोड़ने के लिए मैं उनसे आग्रह करने लगी। लेकिन वह मुझे यह कहकर टरका देते कि तंबाकू से कोई नहीं मरता। मुझे एहसास हुआ कि लोग या तो जागरूक नहीं हैं या तो वे कुछ जानना ही नहीं चाहते। यहां तक कि स्कूल में पढ़ने वाले मेरे साथी और कुछ सीनियरों को भी मैं वॉशरूम में सिगरेट के कश लगाते देखती थी।

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इन्हीं घटनाओं को ध्यान में रखते हुए मैंने इसी विषय पर अपनी रिपोर्ट तैयार करने का फैसला किया। जब मैंने किशोरों में नशे की लत के बारे में शोध कार्य करके इसकी रूपरेखा अपने पिता से साझा की, तो वह इस विषय चयन से काफी प्रभावित हुए। उन्होंने मुझे इस रिपोर्ट को किताब की शक्ल देने का सुझाव दिया। मेरे परिवार के सदस्यों द्वारा पहले भी किताबें लिखी जा चुकी थीं, सो इस काम के लिए जरूरी आत्मविश्वास के लिए मुझे भटकना नहीं पड़ा।

फिर भी पंद्रह साल की उम्र में किताब लिखना मेरे लिए बहुत आसान नहीं था। मैंने हर चीज पर काम किया, जैसे छोटे बच्चों को सिगरेट मिलती कहां से है आदि। छह महीनों के भीतर मैंने अपनी किताब द बर्निंग ट्रुथ पूरी कर ली। उपन्यास की शक्ल में इस किताब में किशोरों में पनपने वाली धूम्रपान की लत का पूरा ब्योरा है, जिसमें कई मनोचिकित्सकों के साक्षात्कार भी शामिल हैं। किताब छपने के बाद सैकड़ों प्रतियां स्कूल के स्टॉल पर चंद घंटों में बिक गई। किताब की बिक्री से हुई कमाई को मैंने मुंबई आधारित एक एनजीओ को दान कर दिया।

मेरे कई जूनियरों ने किताब पर काम करने के लिए मुझसे सलाह ली है। मुझे उनकी मदद करके बेहद संतुष्टि हासिल हुई। मुझे कई छात्र हाथ में मेरी किताब लिए दिख जाते हैं। मगर मैं उस दिन के इंतजार में हूं, जब कोई आकर मुझसे बोले कि आपकी किताब ने मुझे धूम्रपान छोड़ने के लिए विवश कर दिया।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।

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