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सुजातुल्लाह बने इंसानियत की मिशाल, खुद नाश्ता करने से पहले हर रोज एक हजार लोगों को खिलाते हैं खाना

Sat, 14 Jul 2018 01:53 PM IST
मोहम्मद सुजातुल्लाह
मोहम्मद सुजातुल्लाह Updated Sat, 14 Jul 2018 01:53 PM IST
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Sujatullah from hyderabad serve food thousand people every day before taking breakfast

हर सुबह जल्दी उठने के साथ मैं हर हाल में सात बजे तक घर छोड़ देता हूं। इसके बाद मैं शहर के एक बड़े अस्पताल में पहुंचता हूं, जहां लाइन लगाकर करीब तीन सौ लोग मेरा इंतजार कर रहे होते हैं। मुश्किल से आधा घंटा लगता है और मैं अपने दो सहायकों की मदद से इन सभी लोगों को गर्मा-गर्म नाश्ता बांट देता हूं। यहां से फारिग होते ही मैं अपने अगले मुकाम की ओर निकल जाता हूं, जो कि एक दूसरा अस्पताल ही है। यहां भी इधर-उधर फर्श या फुटपाथ पर सोने वाले सैकड़ों लोग नाश्ते के लिए मेरे इंतजार में बैठे मिलते हैं। इन्हें नाश्ता कराने के बाद मैं कॉलेज जाता हूं।

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मैं हैदराबाद के सुलतान उल उलूम कॉलेज में फार्मेसी की पढ़ाई कर रहा हूं। इसे पारिवारिक संस्कार कहिए या फिर मेरी खुद के दिमाग की उपज, दो साल पहले मैंने कॉलेज की सालाना परीक्षा पास करने पर अलग ही तरीके से खुशी मनाने की योजना बनाई थी। परिणाम आया और मैं ठीक-ठाक नंबरों से पास हो गया। पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के तहत मैं अपने जेब खर्च की मदद से सिकंदराबाद रेलवे स्टेशन पर जरूरतमंदों का पेट भरने गया। मैं उनके लिए कढ़ी-चावल ले गया था। मैंने सोचा था कि वहां चंद लोग ही होंगे, जिन्हें मेरे खाने की जरूरत होगी। लेकिन दरिद्रों की भीड़ से घिरने और दर्जनों बच्चों के फैले हाथों को देखकर मुझे पहली बार एहसास हुआ कि भूख आखिर होती क्या है!
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सभी को थोड़ा-बहुत खाना बांटने के बाद मुझे जीवन में पहली दफा अपने काम से एक विशेष संतुष्टि का एहसास हुआ। उस दिन घर लौटते ही मैंने अपने परिवार के वरिष्ठ सदस्यों से बात की। मैंने उनसे आग्रह किया कि वे महीने में एक दिन की कमाई ऐसे लोगों के पेट भरने में खर्च करें। पहले तो उन्होंने मुझे समझाया कि मेरी सोच बहुत नेक है, मगर अभी मुझे मन लगाकर पढ़ाई करनी चाहिए, फिर नौकरी-शादी और रिटायरमेंट के बाद समाज सेवा करना बेहतर रहेगा। अभिभावक के नाते उनकी बातें बुरी नहीं थी, लेकिन समर्पण या यों कहें कि मेरी जिद के आगे उनकी एक न चली।

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उन्होंने न सिर्फ मुझे इजाजत दी, बल्कि मेरी आर्थिक मदद भी की। और मैं हफ्ते में कम से कम दो-तीन बार दर्जनों गरीबों को खाना खिलाने लगा। आज मैं लोगों को जो भी खाना खिलाता हूं, वह स्वास्थ्य के मानकों पर खरा होता है। मैं करीब हजार लोगों के लिए पास के एक होटल से नाश्ता तैयार कराता हूं। मेरा काम देखते हुए होटल ने नाश्ते की दर बहुत कम रखी है, फिर भी हर दिन साढ़े तीन हजार रुपये का खर्च आता है।

डिस्पोजल प्लेट और दूसरे मदों में अलग से पांच सौ रुपये खर्च होते हैं। ये सारे खर्च करीब डेढ़ वर्ष पहले अस्तित्व में आई मेरी संस्था ह्यूमैनिटी फर्स्ट फाउंडेशन को मिले चंदे से पूरे होते हैं। संस्था बनी, तो मैंने कई दूसरे तरह के काम भी शुरू कर दिए। मसलन, सड़कों पर छोड़ दिए गए लोगों की मदद करना और फुटपाथों पर रहने वाले गरीबों तक दूसरी तरह की सहायता पहुंचाना।

जीने की उम्मीद खो चुके ऐसे लोगों को हम जीवन की खूबसूरती के बारे में समझाते हैं। दान दाताओं के सहयोग के साथ, मैं झुग्गी-झोपड़ियां में नियमित चिकित्सा शिविरों का आयोजन कराता हूं और चेक-अप के बाद नि:शुल्क दवाइयां भी बांटता हूं। मेरा मानना है कि पच्चीस लोगों के परिवार का सदस्य होने के नाते किसी को भी कई तरह की दिक्कतें हो सकती हैं, मगर उसे चीजें साझा करने का शानदार अनुभव भी हासिल होता
है।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।

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