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महिलाओं को मासिक धर्म स्वच्छता के बारे में जागरूक कर सफाई की अहमियत सिखा रही हैं सुहानी

Tue, 01 May 2018 12:06 PM IST
सुहानी जलोटा
सुहानी जलोटा Updated Tue, 01 May 2018 12:06 PM IST
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Suhani Jalota- young reformist who working for women healthcare, Founder Myna Mahila Foundation
Suhani Jalota

एक अमेरिकी विश्वविद्यालय से जुड़े अपने कार्यक्रम के तहत मैं उस वक्त मुंबई की झुग्गी-झोपड़ियों के बाशिंदों के साथ बतौर स्वयंसेवक काम कर रही थी। उस कार्यक्रम से जुड़े हर आदमी की चाहत थी कि वह अपने काम से कार्यक्रम प्रबंधकों को ज्यादा से ज्यादा प्रभावित करे, जिसके एवज में उसे सर्वाधिक तवज्जो मिले। मैं भी इसी कोशिश में थी।

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मैंने वहां की औरतों के साथ कई दिन बिताए। उनसे बातचीत के दौरान मैंने उनकी समस्याओं को जानना चाहा। वैसे तो उनकी समस्याओं की फेहरिस्त बहुत लंबी थी, लेकिन शौचालय का न होना उन महिलाओं की सबसे प्रमुख समस्या था। उन्होंने मुझे बताया कि शौच के लिए उन्हें दूर के सामुदायिक शौचालय तक जाना पड़ता है। ऊपर से वे शौचालय बहुत गंदे होते हैं, लेकिन मजबूरी में वे उन्हें ही इस्तेमाल करती हैं।
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इतना ही नहीं, मासिक धर्म के वक्त भी उन्हें कई दिक्कतें उठानी पड़ती हैं। उनके समाज में अगर किसी ने भी उन्हें सैनेटरी पैड ले जाते देख लिया, तो वह उनका मजाक बनाता था और उनके बारे में असभ्यता से उल्टा-सीधा बोलता। और यह व्यवहार बेहद आम था, जिस वजह से वे महिलाएं एक ही पैड लंबे समय तक प्रयोग करने को विवश रहतीं। इन बातों पर पहले-पहल मुझे विश्वास ही नहीं हुआ। देश की आर्थिक राजधानी मुंबई के केंद्र में महिलाएं इन परिस्थितियों में जी रही हैं, यह जानना मेरी जैसी छात्रा के लिए आश्चर्यजनक। यह आश्चर्य बोध ही शायद हमारे कार्यक्रम का मकसद था। लेकिन मेरे दिमाग में एक और मकसद पल रहा था। वह यह था कि मैं इन महिलाओं के लिए क्या कर सकती हूं!

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Suhani Jalota- young reformist who working for women healthcare, Founder Myna Mahila Foundation

कुछ समय बाद उन परिवारों से मेरा विशेष जुड़ाव हो गया। एक रात उन्हीं परिवारों में से एक महिला के छोटे बेटे ने मुझे फोन किया। उसने लगभग रोते हुए मुझे बताया कि उसकी मां के शरीर से खून बह रहा है और उसे अस्पताल ले जाना है। उस बच्चे ने मुझसे तुरंत आने का आग्रह किया। मैं वहां गई और उस महिला को अस्पताल ले गई, जहां डॉक्टर ने हमें बताया कि उसे मासिक धर्म से जुड़ी पुरानी समस्या है, लेकिन उसने कभी इसकी फिक्र नहीं की।

उस रात मुझे एहसास हुआ कि मैं कुछ तो कर सकती हूं। कुछ ऐसा, जिससे इन महिलाओं की जिंदगी में बदलाव आए। मैंने बहुत बड़ी शुरुआत नहीं की, बल्कि इन महिलाओं को सिर्फ मासिक धर्म स्वच्छता के बारे में जागरूक करने लगी। धीरे-धीरे महिलाओं को मेरी बात समझ में आने लगीं और हमारी बातचीत में दूसरी महिलाएं भी जुड़ने लगीं। अपनी बातों का प्रभाव देख मैं गद्गद थी। चंद दिनों में ही मैंने एक फाउंडेशन बनाने का निर्णय लिया।

मेरा निर्णय बिल्कुल सही निकला और अन्य लोगों की मदद से बहुत शीघ्र ही हमने उन जरूरतमंद परिवारों के लिए अनेक काम करने शुरू कर दिए। मगर हमारा मुख्य लक्ष्य महिलाओं के लिए शौचालय और सैनेटरी पैड मुहैया कराना रहा, क्योंकि इन्हीं दो जरूरतों को मैंने बहुत करीब से महसूस किया था। अपनी संस्था, मायना महिला के जरिये फंड इकट्ठा करके मैंने कई शौचालय बनवाए। फिर मैंने एक ऐसी व्यवस्था की, जिससे उन औरतों को कम से कम दामों में सैनेटरी पैड मुहैया हो सके। हमने इस लक्ष्य को भी हासिल किया। आज हमारी संस्था इस स्तर पर पहुंच चुकी है कि इसने पचास महिलाओं को रोजगार भी दिया है।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।

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