सतीश जांगड़े: जिन्होंने निःशक्त बच्चों की मदद के लिए नौकरी छोड़ दी
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मैं महाराष्ट्र में कोल्हापुर जिले के नंदनी गांव में रहता हूं। मैं बचपन से ही पोलियो का शिकार हूं। लेकिन मेरे लिए परेशानी सिर्फ इतनी ही नहीं थी, परिवार की गरीबी भी मेरी अनचाही विरासत थी। मेरे पिता एक कताई मिल में मजदूरी करते थे। घर की खराब आर्थिक स्थिति ने नौवीं कक्षा के बाद मुझसे स्कूल छीन लिया।
पोलियो की वजह से मैं ठीक से चल नहीं सकता था, लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं कि मैं पूरी तरह निःशक्त था। सरकारी प्रमाणपत्र में भी मेरे शरीर को मात्र बयालीस फीसदी अक्षम माना गया है, जिसका अर्थ है कि मेरे शरीर का बड़ा हिस्सा सामान्य है।
बारह की उम्र में मैंने परिवार को सहारा देने के लिए काम करना शुरू कर दिया। मैं गांव के पशुपालकों से दूध एकत्रित करता और साइकिल की मदद से करीब चौबीस किलोमीटर दूर शहर में जाकर उसका वितरण करता। मैं यह काम खत्म करने के बाद स्कूल जाता था। लेकिन आधे शरीर के चलते वह दोहरी भूमिका मैं ज्यादा दिन निभा नहीं सका। नतीजतन मेरी पढ़ाई छूट गई। बाद में मैंने दो सौ रुपये मासिक वेतन वाली दूसरी नौकरी शुरू कर दी।
गांव में ही वित्तीय प्रबंधन संभालने वाले एक समुदाय के लिए काम करते हुए मैंने तेईस साल गुजार दिए। इस दौरान मैं हमेशा से ही अपने जैसे शारीरिक रूप से अक्षम लोगों के लिए कुछ न कुछ करना चाहता था।
अपनी इसी सोच के विस्तार के लिए दस साल पहले मैंने एक संस्था का गठन किया। मेरे लिए जरूरी था कि किसी भी जरूरतमंद की मदद करने से पहले जरूरी धन इकट्ठा कर लिया जाए। शुरू में मैंने यही सोचा था कि जो लोग चिकित्सा की मदद से निःशक्तता के श्राप से मुक्ति पा सकते हैं, उनकी मदद की जाए। कुल जमा पांच हजार की तनख्वाह वाली नौकरी करते हुए मेरे लिए ऐसा निर्णय करना आसान नहीं था। लेकिन एक अच्छी नीयत को लोगों का अभूतपूर्व समर्थन मिला। संस्था बनी, तो जरूरतमंद लोगों ने मुझसे संपर्क किया।
महाराष्ट्र के आठ अलग-अलग जिलों के आठ निःशक्त बच्चे मदद की उम्मीद में मेरे पास आए। ये बच्चे मेरे बचपन के प्रतिरूप थे। मैंने इनके लिए श्रवणबल निःशक्त वस्तिगृह नाम से एक आश्रय स्थल की शुरुआत की। मेरी पत्नी इस पूरे सफर में मजबूती के साथ मेरे साथ रही। वही बच्चों के लिए खाना पकाती, उनके कपड़े धोती और हॉस्टल के दूसरे काम भी निपटाती।
इन बच्चों का संपूर्ण खर्च मैं और मेरे सहयोगी उठाते। यहां तक कि हॉस्टल की सुरक्षा के लिए मेरा एक मित्र बच्चों के साथ रहता। इन बच्चों की सेवा करते-करते मुझे आनंद आने लगा। इसका नतीजा यह निकला कि इनकी पूरी तरह मदद करने के लिए डेढ़ साल पहले मैंने नौकरी छोड़ दी। अल्प आय वाले परिवारों से आने वाले इन बच्चों को मेरे अनुभवों की जरूरत थी।
लोगों से मिले चंदे और अपनी बचत की मदद से मैंने अब तक चालीस ऑपरेशनों में निःशक्तों की मदद की है। इसके अलावा मैंने विभिन्न सरकारी और चैरिटी मदों से दो सौ कृत्रिम अंग, चार सौ सुनने की मशीन और सैकड़ों व्हीलचेयर की भी व्यवस्था की है। मेरा सपना है कि मैं इन बच्चों के लिए अपना खुद का विशेष स्कूल खोलूं। मैं इस योजना पर काम कर रहा हूं।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।