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रानी अवस्थी: मातृत्व की छाया के साथ दिव्यांगों को दी खुशियां

Tue, 16 Jan 2018 03:44 PM IST
अभियान डेस्क, अमर उजाला
अभियान डेस्क, अमर उजाला Updated Tue, 16 Jan 2018 03:44 PM IST
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success story of Rani Awasthi- gave happiness to disabled people with love of motherhood
Rani Awasthi - फोटो : अमर उजाला

मैं बचपन में देखती थी कि मेरे पिता किसी भी भिखारी को बिना खाना खिलाए दरवाजे से वापस नहीं भेजते थे। मैं पिता जी को अनेक विक्षिप्तों की सेवा करते देखते हुए बड़ी हुई हूं, इसलिए दूसरों की सेवा के बीज मेरे अंदर शुरू से ही अंकुरित हो गए थे। मैं मूलतः इलाहाबाद से ताल्लुक रखती हूं, लेकिन मेरी कर्मभूमि बनी अयोध्या। इसके पीछे भी एक कहानी है। मेरा परिवार प्रभु राम का भक्त था। हम सपरिवार नियमित अंतराल पर अयोध्या आते रहते थे।

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करीब सैंतीस साल पहले इसी क्रम में मैं अयोध्या आई हुई थी, तभी मैंने अयोध्या के सरयू तट पर कुछ ऐसे बच्चों को भीख मांगते देखा, जो शारीरिक रूप से अक्षम थे। वे बच्चे बिल्कुल असहाय थे। उनमें से कुछ मानसिक तौर पर भी दिव्यांग दिख रहे थे। मैंने देखा कि उनके होने या न होने से किसी को फर्क नहीं पड़ रहा था।
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दर्शन करके मैं इलाहाबाद तो लौट गई, पर रह-रहकर उन बच्चों की तस्वीर मेरे जेहन में कौंधती रही। मैं उन बच्चों के लिए कुछ करना चाहती थी। मैं मतलब भर की पढ़ी-लिखी थी, संपन्न परिवार से थी, आर्थिक तौर पर कोई बड़ी परेशानी भी न थी। मैंने सोचा क्यों न इन विशेष बच्चों के लिए एक स्कूल खोला जाए।
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मैंने अपने मन की बात अपने पति को बताई, तो उन्होंने मेरे विचार को समर्थन दिया। मैं वापस अयोध्या आई और फैजाबाद जिले के कुछ अन्य समाजसेवियों से मशविरा करके, उनकी मदद से मंदबुद्धि और मूक-बधिर बच्चों के लिए एक स्कूल खोला। स्कूल खोलने के बाद तो मैंने अपना जीवन इन्हीं बच्चों के लिए समर्पित कर दिया।

success story of Rani Awasthi- gave happiness to disabled people with love of motherhood
Rani Awasthi

पिछले छत्तीस वर्षों से मैंने अपना संकल्प जीवित रखा है और मैं इन्हीं बच्चों के लिए काम कर रही हूं। मेरे स्कूल में अब तक करीब दस हजार शारीरिक और दिमागी रूप से अशक्त बच्चे शिक्षा एवं रोजगार प्रशिक्षण प्राप्त कर चुके हैं। मूक-बधिरों को सांकेतिक भाषा के जरिये शिक्षा दी जाती है।

मेरे स्कूल में बच्चों को सांस्कृतिक कार्यक्रमों से जोड़ने के साथ उन्हें शारीरिक खेलों से भी जोड़ा जाता है। यहां से निकलने वाले बच्चे देश की प्रगति में अपनी सक्रिय भागीदारी निभा रहे हैं। कुछ बच्चे सरकारी विभागों में भी तैनात हैं।

फैजाबाद की छावनी परिषद में काम करने वाला रामस्वरूप उन्हीं बच्चों में से एक है, जो एक मूक-मधिर अनाथ है। आज वह सरकारी नौकरी भी कर रहा है, साथ ही एक सामान्य लड़की से शादी करके अपनी जिंदगी खुशी-खुशी जी रहा है। मेरा हमेशा से यही मानना है कि इस धरती पर जन्म लेने वाली प्रत्येक आत्मा एक समान हकों की अधिकारी है। ऐसे में इन अशक्त बच्चों की सामाजिक उपेक्षा क्यों की जाती है, बल्कि इन्हें तो मुख्यधारा से जोड़ने के लिए विशेष प्यार की आवश्यकता है।

मैं अपने मुख्य काम के अलावा अनाथ बच्चे, पैदा होते ही फेंक दी गई बच्चियों के पुनर्वास, बुजुर्गों को सहारा देने और अपंगों को तिपहिया साइकिल आदि देने का कार्य भी कर रही हूं। इन सारे कामों के लिए मुझे लोगों की मदद मिलती रहती है।

शिक्षिका के तौर पर साढ़े तीन दशक की लंबी नाबाद पारी खेलकर मुझे अपने काम पर संतोष है। मेरी उम्र बासठ पार हो चली है, मगर मैंने अभी आराम करने के बारे में नहीं सोचा है। अपने अनुभवों के आधार पर भविष्य में मैं एक ऐसा आश्रयस्थल बनाना चाहती हूं, जहां अनाथ बच्चों के अलावा समाज से दुत्कारे गए हर शख्स को एक नया परिवार मिल सके।

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