मुरुगन एस: ऑटो चलाकर दिया बेसहारा बच्चों को सहारा
हर सुबह, जब मैं अपना ऑटो रिक्शा लेकर शहर की सड़कों पर निकलता हूं, तब मेरी आंखें केवल सवारियों को ही नहीं ढूंढती, बल्कि वे ढूंढती हैं उन बच्चों को, जिनके नन्हे हाथ किसी के आगे भीख मांगने के लिए फैले होते हैं।
अगर मुझे कोई ऐसा बच्चा दिखता है, तो मैं उसकी तस्वीर खींचता हूं और तस्वीर के सहारे नजदीकी पुलिस थाने में जाकर इसकी शिकायत करता हूं। बेसहारा बच्चों के लिए काम करने का जब मैंने निर्णय लिया था, उस वक्त मैं सिर्फ 16 साल का था। मेरे लिए यह फैसला बहुत आसान नहीं था, क्योंकि मैं शारीरिक रूप से उतना मजबूत नहीं हुआ था और आय का तो कोई निश्चित जरिया था ही नहीं, जो मेरे प्रयासों को सुविधाजनक बना सके।
मैंने सरकार या जनता से किसी तरह की मदद भी नहीं चाही थी। फिर भी पिछले 18 वर्षों में मैंने सिलाई करने से लेकर कई तरह की छोटी-बड़ी नौकरियां कीं और अपना संघर्ष जारी रखा है। तमिलनाडु के चंगोता जिले में रहने वाले मेरे मां-बाप काम के सिलसिले में केरल आ गए थे। मेरी पैदाइश यहीं हुई। मेरा बचपन एक झुग्गी बस्ती में गुजर रहा था। शायद मैं भी उस वक्त सड़कों पर भीख मांग रहा था, तभी तो मेरे मुंहबोले भाई ने मुझे वहां से निकालकर एक बेहतर जिंदगी दी।
वह एक प्रख्यात समाज सेवक हैं। उन्होंने मेरे जैसे तमाम बच्चों की उंगली थामकर उन्हें स्नेहभवन में पाला-पोसा है। वही अनाथालय वर्षों तक मेरा घर रहा। मुक्त विद्यालय से इंटर तक की पढ़ाई करने के बद जब मेरे हाथ थोड़े मजबूत हो गए, तब मैं स्नेहभवन से निकलकर कोच्चि आ गया।
चूंकि मैं खुद अनाथालय में पला-बढ़ा हूं, इसलिए मेरे दिल की धड़कनें मेरे जैसे बच्चों के लिए हमेशा धड़कती रहती हैं। यही वजह थी कि मैं कोच्चि में एक चाइल्ड लाइन से जुड़ गया। यहां आकर मुझे बेघर बच्चों की कई और दर्द भरी कहानी सुनने को मिलीं।
अखबार बेचने जैसे काम करने के बाद आज मैं कोच्चि की सड़कों पर ऑटोरिक्शा चलाता हूं। सड़कों पर घूमने वाले बिना किसी पहचान के बेघर, अनाथ बच्चों की जिंदगी संवारने के एक मात्र उद्देश्य से वर्ष 2007 में मैंने अपनी संस्था थेरुवोरम की स्थापना की थी।
मेरे काम में मेरी पत्नी ने मेरा पूरा साथ दिया है, जो एमबीए डिग्री धारक है। उसने अपनी अच्छी-खासी नौकरी छोड़कर नेक इरादों के साथ मेरा हाथ थामकर मेरी जीवन संगिनी बनने का फैसला किया था।
दया व करुणा की मूर्ति मदर टेरेसा मेरी प्रेरणा और आदर्श हैं। पिछले अट्ठारह वर्षों से मैं अब तक राज्य और शहर के अलग-अलग कोने से कई हजार बच्चों को उनकी पुरानी जिंदगी से निकालकर एक बेहतर जीवन देने की कोशिश कर रहा हूं। दुनिया में ऐसे अनेक लोग हैं, जो गरीबी खत्म करने के लिए पर्याप्त समृद्ध हैं, लेकिन कम ही लोग इस दिशा में कुछ सोचते हैं।
मैं मानता हूं कि अगर किसी अच्छे काम के लिए अपने धन का इस्तेमाल ही न किया जाए, तो धन प्राप्त करने का क्या मतलब है? मेरा लक्ष्य बेसहारा बच्चों को न सिर्फ एक आश्रय प्रदान करना है, बल्कि मैं समाज में बदलाव लाने की भी ख्वाहिश रखता हूं, और जब तक मैं इसे प्राप्त नहीं करूंगा, तब तक नहीं रुकूंगा।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।