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जानिए कैसे एक महिला सफाई की जिद से बनी गांव की लीडर

Mon, 29 Jan 2018 02:27 PM IST
संपादकीय डेस्क, अमर उजाला
संपादकीय डेस्क, अमर उजाला Updated Mon, 29 Jan 2018 02:27 PM IST
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success story of lakshmi periasamy who change her village to cleanliness campaign
मैं वह करती हूं, जो मेरे गांव के लिए अच्छा है। अगर कुछ भी गलत दिखता है, तो मैं उसे सुधारने का हर संभव प्रयास करती हूं। मैं तमिलनाडु के त्रिची स्थित सामूतिरम गांव में रहती हूं। आप मुझे उन लोगों में शामिल कर सकते हैं, जिनके लिए साफ-सफाई कुछ ज्यादा ही महत्व रखती है। मैं खुद तो सफाई पसंद हूं ही, साथ ही अपने आसपास के लोगों को भी अपने जैसा रखने की कोशिश करती हूं।
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लोग अपनी आदत के मुताबिक, सड़कों पर चीजें फेंक देते हैं। बेपरवाही में मशगूल उन्हें यह भी अंदाजा नहीं होता कि वे अपनी ही जमीन गंदी कर रहे हैं, जिसे साफ रखने की जिम्मेदारी उनकी भी है। जब कभी मैं गांव में किसी को गंदगी फैलाते देखती, मुझे खराब लगता। मैं स्वयंसेवक के तौर पर खुद ही गांव की सड़कों पर उन्हें साफ करने के लिए उतर गई। मैंने अपने व्यक्तिगत प्रयासों से सड़कों के किनारे कूड़ेदान रखवाए।
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गांव में ऐसी व्यवस्था सुनिश्चित की कि लोग पुराना प्लास्टिक यहां-वहां फेंकने के बजाय एक जगह एकत्रित करें, जिससे उसे रीसाइकिल किया जा सके। हालांकि हर नई शुरुआत में मुझे लोगों के असहयोग का सामना करना पड़ा, लेकिन धीरे-धीरे ही सही, पर बाद में मुझे सफलता मिलती गई।
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प्लास्टिक और कचरे के बाद मेरे गांव में सबसे बड़ी समस्या खुले में शौच की थी। यहां तक कि जिन घरों में शौचालय बने हुए थे, उन घरों के लोग भी शौच के लिए खेतों में ही जाते थे। यह स्थिति दो साल पहले की थी, लेकिन आज चीजें बदल गई हैं। इस सुखद बदलाव के लिए मैंने खूब मेहनत की है। हालांकि मेरे दो पड़ोसियों समेत गांव में अब भी पंद्रह घर ऐसे बचे हैं, जहां शौचालय नहीं बना है। पर मैं कोशिश में हूं कि उन्हें भी समझाकर शीघ्र ही अपने गांव को खुले में शौच की शर्म से मुक्त करा दूं।

अपने काम के बारे में खुद जिक्र करने से कई लोग मुझे घमंडी समझते हैं, मगर उन्हें अंदाजा नहीं कि जिस बदलाव को होते हुए मैंने महसूस किया है, उससे मुझे किस स्तर की खुशी मिली है। सबसे बड़ी बात यह कि मैं कोई सरकारी कर्मी नहीं, बल्कि मात्र एक स्वयंसेवक हूं, इसलिए मेरे लिए कुछ खोने या पाने जैसी कोई स्थिति नहीं है। मेरा काम तो बस मेरी उस कल्पना का परिणाम है, जिसको जिद बनाकर मैंने किया है।

मुझे वह दिन भी याद है, जब मैं किसी के पास जाकर अपनी बात कहती थी, तो लोग दूर से ही हाथ जोड़कर मुझे भगा देते थे। इन बातों से विचलित न होने का परिणाम है कि आज जब मैं कुछ कहती हूं, तो लोग ध्यान से सुनते हैं। मैंने अपने कुछ दूसरे साथियों की मदद से लोगों को स्वच्छता के महत्व से परिचित कराया है।

अमर उजाला के मंजिलें और भी है से साभार

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