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भजनदास पवार: इनकी मेहनत से पानी के लिए तरसता गांव खेती की नजीर बन गया

Fri, 12 Jan 2018 08:48 AM IST
भजनदास पवार
भजनदास पवार Updated Fri, 12 Jan 2018 08:48 AM IST
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Success story of BhajanDas Pawar- a village where had lack of water became an example of farming

मैं पुणे से करीब एक सौ बीस किलोमीटर दूर इंदापुर तालुका के कड़बनवाड़ी गांव में रहता हूं। मेरा गांव करीब पंद्रह सौ हेक्टेयर के क्षेत्रफल में फैला है, जिसमें साढ़े तीन सौ परिवारों के सोलह सौ से ज्यादा लोग रहते हैं। तमाम रिपोर्टों में मेरे गांव को महाराष्ट्र के उन इलाकों में रखा गया है, जहां पानी की उपलब्धता खतरे के स्तर पर है।

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मैं अपने गांव में ही पला-बढ़ा और पूरे गांव का पहला व्यक्ति था, जिसने विज्ञान में स्नातक की पढ़ाई की हो। बाद में मैंने पुणे जाकर बीएड भी किया और अपने गांव से करीब पचास किलोमीटर दूर एक विद्यालय में अट्ठाइस वर्षों तक अध्यापन कार्य किया। अपने करियर के दौरान मैंने कई लोगों के बारे में सुना, जिन्होंने अपने-अपने स्तर से गांव की बेहतरी के लिए काम किया था। अपने गांव के लिए कुछ ऐसा करने की मेरी इच्छा भी प्रबल होती जा रही थी। लेकिन मेरी प्रेरणा में सबसे बड़ा योगदान अन्ना हजारे ने दिया।
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ग्रामीण महाराष्ट्र के लिए काम करने के अपने अभियान में वह 1994 में मेरे गांव में पधारे। उन्होंने मुझसे व्यक्तिगत रूप से जल संरक्षण के उपायों के बारे में चर्चा की और इस दिशा में काम करने का सुझाव दिया। दरअसल मेरे क्षेत्र में पानी की इतनी दिक्कत थी कि इंसानों और पशु-पक्षियों तक को पीने का पानी नहीं मिल पाता था। यही सब देखकर अन्ना जी ने मुझे अपने गांव रालेगण सिद्धि में चलाए जा रहे सरकारी प्रशिक्षण कार्यक्रम में भाग लेने का निमंत्रण दिया।
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मैंने प्रशिक्षण प्राप्त किया और वापस गांव लौटकर जल संरक्षण की दिशा में काम करना शुरू कर दिया। मेरे लिए किसी भी बदलाव के लिए स्थानीय लोगों खासकर युवाओं का साथ जरूरी था, जिसे हासिल करने में मुझे शुरुआती मुश्किलों का सामना करना पड़ा।

Success story of BhajanDas Pawar- a village where had lack of water became an example of farming

पानी की उपलब्धता लगातार कम होती जा रही थी, जिसको रोकना बेहद जरूरी हो रहा था। मैंने तालाब पक्के करने का बीड़ा उठाया। हर हाल में पानी मिट्टी से दूर रहे, इसके भरसक प्रयास किए। कम पानी से सिंचाई हो सके, इसके लिए किसानों से खेती के लिए डीप इरिगेशन तकनीक का प्रयोग कराना शुरू किया। धीरे-धीरे ही सही, पर जैसे-जैसे किसानों में जागरूकता आती गई, उन्होंने तकनीक इस्तेमाल करके खेती शुरू की।

मेरे प्रयासों का नतीजा यह निकला कि आज कड़बनवाड़ी के लगभग सभी किसान खुशहाली के साथ अनार और गन्ना जैसी नकदी फसलों की खेती उन्न्त तरीके से कर रहे हैं। जिस इलाके में कभी पानी की कमी के कारण खेती बदहाल एवं घाटे का सौदा बन गई थी, आज वही गांव दूसरे लोगों के लिए नजीर बन गया है।

मृदा और जल संरक्षण के प्रयासों को अंजाम तक पहुंचाने के बाद मेरा अगला प्रयास गांव के पास फैले करीब पांच सौ हेक्टेयर में फैले जंगल के संरक्षण से जुड़ा है। इन जंगलों में रहने वाले चिंकारा को शिकारियों से बचाना भी मेरी योजना का हिस्सा है।

मेरे अब तक के पूरे सफर का एकमात्र मकसद यही है कि गांव के लोग गांव में ही रहकर गांव की समस्याएं खत्म करने की दिशा में काम करें। विकास का गांधी मॉडल यही है। अब कोई भी कड़बनवाड़ी वासी गांव से बाहर रोजगार के लिए नहीं जाता और न ही बच्चों को पढ़ाई छोड़कर घर वालों की मदद करनी पड़ती है।

-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।

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