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साइकिल के पहियों से दी इंसानियत को रफ्तार
बालू गायकवाड़
Updated Fri, 13 Jul 2018 04:41 PM IST
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मेरा गांव रास्ते में पड़ता है। तीन दशक पहले एक धार्मिक यात्रा हेतु बाबूराव नाम का एक किसान महाराष्ट्र के सोलापुर जिले के पंढरपुर जा रहा था। रात का वक्त था कि अचानक से तेज बारिश शुरू हो गई। बाबूराव बारिश से बचने का ठिकाना ढृंढ ही रहा था कि उसकी मुलाकात मुझसे हो गई। मैंने न सिर्फ उसके रुकने का इंतजाम किया, बल्कि उसे खाना खिलाया और किसी भी आपात स्थिति के लिए जाते वक्त उसे कुछ रुपये भी दिए।
मैं चौरासी साल का हूं और कर्नाटक के बेलगाम जिले के एक गांव में साइकिल रिपेयरिंग की दुकान चलाता हूं। बचपन में प्राथमिक शिक्षा हासिल करने के बाद मैं आगे नहीं पढ़ सका, क्योंकि घर के पास कोई हाई स्कूल नहीं था। मेरे पिता मुझे सेना में भर्ती कराना चाहते थे। मैंने प्रयास भी किया, पर मेरी उम्र कम होने के कारण ऐसा संभव नहीं हो सका।
उसके बाद मेरे चाचा ने पास के कस्बे की एक किराने की दुकान पर मुझे पैंतालीस रुपये मासिक तनख्वाह वाला काम दिला दिया। कुछ वक्त वहां काम करने के बाद मेरे बड़े भाई ने मुझे साइकिल रिपेयरिंग की दुकान खोलने की सलाह दी। हालांकि मुझे साइकिल रिपेयर करने का कोई अनुभव नहीं था, लेकिन कुछ दिनों के अभ्यास के बाद मैंने यह काम सीख लिया। कुछ साल घर के पास ही दुकान चलाने के बाद मैंने बस स्टैंड की एक दुकान किराये पर ले ली।
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बीती सदी के सत्तर के दशक की बात है। रामगोंडा, जो कि उस वक्त ग्यारहवीं में पढ़ता था, मेरी दुकान पर आया और उसने मुझसे एक साइकिल किराये पर देने का आग्रह किया। मैं जानता था कि वह एक गरीब परिवार से आता है और यदि उसके लिए साइकिल का इंतजाम नहीं हुआ, तो निश्चित रूप से उसकी पढ़ाई ठप हो जाएगी, क्योंकि उसका कॉलेज उसके घर से बारह किलोमीटर दूर था।
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मैं चौरासी साल का हूं और कर्नाटक के बेलगाम जिले के एक गांव में साइकिल रिपेयरिंग की दुकान चलाता हूं। बचपन में प्राथमिक शिक्षा हासिल करने के बाद मैं आगे नहीं पढ़ सका, क्योंकि घर के पास कोई हाई स्कूल नहीं था। मेरे पिता मुझे सेना में भर्ती कराना चाहते थे। मैंने प्रयास भी किया, पर मेरी उम्र कम होने के कारण ऐसा संभव नहीं हो सका।
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उसके बाद मेरे चाचा ने पास के कस्बे की एक किराने की दुकान पर मुझे पैंतालीस रुपये मासिक तनख्वाह वाला काम दिला दिया। कुछ वक्त वहां काम करने के बाद मेरे बड़े भाई ने मुझे साइकिल रिपेयरिंग की दुकान खोलने की सलाह दी। हालांकि मुझे साइकिल रिपेयर करने का कोई अनुभव नहीं था, लेकिन कुछ दिनों के अभ्यास के बाद मैंने यह काम सीख लिया। कुछ साल घर के पास ही दुकान चलाने के बाद मैंने बस स्टैंड की एक दुकान किराये पर ले ली।
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बीती सदी के सत्तर के दशक की बात है। रामगोंडा, जो कि उस वक्त ग्यारहवीं में पढ़ता था, मेरी दुकान पर आया और उसने मुझसे एक साइकिल किराये पर देने का आग्रह किया। मैं जानता था कि वह एक गरीब परिवार से आता है और यदि उसके लिए साइकिल का इंतजाम नहीं हुआ, तो निश्चित रूप से उसकी पढ़ाई ठप हो जाएगी, क्योंकि उसका कॉलेज उसके घर से बारह किलोमीटर दूर था।
उसकी समस्या को देखते ही मैंने तुरंत ही उसे एक साइकिल यह कहकर मुफ्त में दे दी कि जब तुम्हारी पढ़ाई पूरी हो जाए, तब लौटा देना। वक्त बीता और मैं रामगोंडा को साइकिल देने की घटना पूरी तरह भूल गया। पढ़ाई पूरी करने के बाद रामगोंडा को एक स्कूल में प्रशासनिक नौकरी मिल गई। जब वह रिटायर हुआ, तो उसने मुझे अपने विदाई समारोह में आमंत्रित किया। अचानक मिले आमंत्रण की वजह पूछने पर ही मुझे साइकिल वाली घटना पता चली।
रामगोंडा ने उस दिन मेरे प्रति कृतज्ञता दिखाते हुए कहा कि मेरी साइकिल की वजह से ही उसकी जिंदगी संवर सकी। मेरे गांव के पास एक प्रसिद्ध मंदिर है। कई मौकों पर हजारों श्रद्धालु मंदिर जाते हैं। लेकिन काफी वक्त तक मंदिर तक जाने के लिए सार्वजनिक यातायात की उचित व्यवस्था नहीं थी। लोग मेरी दुकान से किराये पर साइकिल लेकर वहां पहुंचते थे। न जाने कितने श्रद्धालु रहे होंगे, जिनके पास साइकिल के किराये तक के पैसे नहीं होते थे।
इलाके में यातायात की वैकल्पिक व्यवस्था न होने तक मैंने कभी किसी को साइकिल देने से मना नहीं किया। वे लोग जो कभी मेरी साइकिलों का प्रयोग करते थे, उनमें से कई आज मेरे घनिष्ठ मित्र हैं और हर रोज मुझसे मिलने मेरी दुकान पर आते हैं। मैंने कभी किसी ग्राहक को साइकिल रिपेयरिंग से जुड़ी किसी बात के लिए मना नहीं किया। आज दुकान पर मेरे साथ मेरा बेटा भी काम करता है, जो खेती का काम भी देखता है। उसने कई बार मुझसे काम छोड़कर घर पर आराम करने की सलाह दी है, पर मैं हर बार उसे मना कर देता हूं। जब तक शरीर चलेगा, तब तक मैं जरूरतमंदों की भलाई का काम करते रहना चाहता हूं।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।
रामगोंडा ने उस दिन मेरे प्रति कृतज्ञता दिखाते हुए कहा कि मेरी साइकिल की वजह से ही उसकी जिंदगी संवर सकी। मेरे गांव के पास एक प्रसिद्ध मंदिर है। कई मौकों पर हजारों श्रद्धालु मंदिर जाते हैं। लेकिन काफी वक्त तक मंदिर तक जाने के लिए सार्वजनिक यातायात की उचित व्यवस्था नहीं थी। लोग मेरी दुकान से किराये पर साइकिल लेकर वहां पहुंचते थे। न जाने कितने श्रद्धालु रहे होंगे, जिनके पास साइकिल के किराये तक के पैसे नहीं होते थे।
इलाके में यातायात की वैकल्पिक व्यवस्था न होने तक मैंने कभी किसी को साइकिल देने से मना नहीं किया। वे लोग जो कभी मेरी साइकिलों का प्रयोग करते थे, उनमें से कई आज मेरे घनिष्ठ मित्र हैं और हर रोज मुझसे मिलने मेरी दुकान पर आते हैं। मैंने कभी किसी ग्राहक को साइकिल रिपेयरिंग से जुड़ी किसी बात के लिए मना नहीं किया। आज दुकान पर मेरे साथ मेरा बेटा भी काम करता है, जो खेती का काम भी देखता है। उसने कई बार मुझसे काम छोड़कर घर पर आराम करने की सलाह दी है, पर मैं हर बार उसे मना कर देता हूं। जब तक शरीर चलेगा, तब तक मैं जरूरतमंदों की भलाई का काम करते रहना चाहता हूं।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।