'गरीब बच्चों को मुफ्त विज्ञान की शिक्षा देता हूं'
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पांच दशक पहले, जब मैं बशीरहाट कॉलेज में पढ़ा रहा था, तो राजनीति में सक्रिय था। उसी दौरान मैं नक्सल आंदोलन से जुड़ गया। मुझे पूरा एहसास है कि मैंने उस आंदोलन के वक्त कई तरह की गलतियां कीं। तमाम गलत फैसले लिए, हालांकि उस आंदोलन से जुड़ने का मेरा मकसद कभी गलत नहीं रहा। मैं हमेशा वंचितों की सेवा करना चाहता था। पुलिस द्वारा सुधार केंद्र भेजे जाने और वहां से रिहा होने के बाद मैंने किसी भी तरह के सशस्त्र आंदोलन से तौबा कर ली। मुझे अपनी भूलों का ज्ञान हो चुका था। मैंने तभी तय कर लिया था कि मैं गरीब बच्चों के बीच विज्ञान की शिक्षा का प्रसार करने का काम करूंगा।
मैं पश्चिम बंगाल में पिछले तीस वर्षों से गरीब बच्चों को भौतिक विज्ञान की निःशुल्क कोचिंग दे रहा हूं। मैं कभी नक्सलवाद के हिंसक रास्ते को चुनने की गलती कर चुका हूं, पर आज संविधान निर्माता बाबासाहेब आंबेडकर की शिक्षाओं को मानता हूं। बाबा साहेब की शिक्षा किसी भी तरह की हिंसा को जायज न ठहराकर सामाजिक जागरूकता और शिक्षा पर जोर देती है। यही वजह है कि स्कूल में पढ़ाने के दौरान मैंने किसी गरीब बच्चे से प्राइवेट ट्यूशन के पैसे नहीं लिए, क्योंकि स्कूल से मिलने वाली तनख्वाह मेरे जीवन यापन के लिए पर्याप्त थी। रिटायरमेंट के बाद मिलने वाली पेंशन भी मेरी जरूरतों के लिए काफी है।
मेरे अतीत की कई बातें याद रखने योग्य नहीं हैं। मगर कई ऐसी बातें हैं, जिन्हें आज मैं ढूंढता रहता हूं। छात्र आंदोलन ऐसी ही एक चीज है। आज के मुकाबले पहले के छात्र आंदोलन ज्यादा ईमानदार हुआ करते थे। मैं कह सकता हूं कि विद्यार्थी जीवन में छात्र आंदोलनों से जुड़ने के कारण ही मेरे दिमाग में अपना कोचिंग इंस्टीट्यूट खोलने का विचार आया था।
मैं चाहता हूं कि बच्चे विज्ञान की शिक्षा से वंचित न रहें, खासकर उन गरीब परिवारों से आने वाले छात्र, जो अक्सर हालात के मारे होते हैं। ऐसे वंचितों से मैं शिक्षण शुल्क लेने की सोच भी नहीं सकता।
हालांकि मेरे लिए लगातार बच्चों को निःशुल्क पढ़ा पाना हमेशा आसान नहीं रहता। वक्त के साथ कोचिंग इंस्टीट्यूट के विकास की जरूरत पड़ती रहती है, जिसके लिए मैंने कई दफे कर्ज भी लिया है। फिलहाल मेरे इंस्टीट्यूट में छह कमरे हैं, जिनमें से भू-तल के दो कमरे कक्षा की तरह प्रयोग किए जाते हैं, बाकी ऊपरी तल के कमरों को प्रयोगशाला का स्वरूप दिया गया है। मैं इन प्रयोगशालाओं को भौतिकी के तमाम उपकरणों से लगातार समृद्ध बनाता रहता हूं। मेरे कुछ पुराने छात्र भी मेरी मदद करते रहते हैं। अभी हाल ही में मेरे पढ़ाए एक छात्र ने मेरे इंस्टीट्यूट को फंक्शन जनरेटर उपहार स्वरूप दिया है।
बच्चों के भीतर भौतिकी के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए मैं अपने छात्रों के साथ मिलकर पूरे जिले के विभिन्न स्थानों पर साइंस क्विज और प्रदर्शनियां लगाता रहता हूं। मैं मानता हूं कि विज्ञान को लोकप्रिय बनाने के लिए कोई भी प्रयास पर्याप्त नहीं हो सकता। किसी भी विज्ञान की कुदरती फितरत विलुप्त होने की है, इसलिए मैं छात्रों को जितना संभव हो सके, इसके प्रति आकर्षित करने की कोशिश करता हूं। शिक्षकों से मेरा आग्रह है कि वे अपनी गंभीर जिम्मेदारी ईमानदारीपूर्वक निभाएं।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आाधारित।