फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Bashindey ›   Struggling story of Nisha tiwari- become hawker for bright future of son

बेटे के उज्जवल भविष्य का सपना, आर्थिक हालात से लड़ने के लिए रोजाना करती हैं 16 घंटे काम

Thu, 12 Apr 2018 12:39 AM IST
निशा तिवारी
निशा तिवारी Updated Thu, 12 Apr 2018 12:39 AM IST
विज्ञापन
Struggling story of Nisha tiwari- become hawker for bright future of son

दो साल के अंतराल में दो शादियां। पहली शादी बाईस की उम्र में और दूसरी चौबीस साल में। लेकिन दोनों ही शादियां विफल। पहली मर्तबा पति की मौत हो गई, तो दूसरे पति के साथ दूसरे किस्म की समस्या। दूसरे पति के साथ बिगड़े रिश्ते ने मुझे इस कदर विचलित कर दिया कि मैं हर रोज नशे की गोलियां खाने लगी। मैं भयानक अवसाद का शिकार हो गई। हैरान, परेशान होकर मैंने एक दिन आत्महत्या करने का मन बना लिया और नदी में छलांग लगाने का प्रयास किया।

विज्ञापन


लेकिन आसपास के लोगों ने मुझे बचा लिया और पुलिस के हवाले कर दिया। और फिर पुलिस ने मुझे नारी सुधार गृह में भेज दिया। मैं गोरखपुर के पास देवरिया में रहने वाली एक ऐसी औरत हूं, जिसे आप न विधवा कह सकते हैं, न ही शादीशुदा। काफी समय पहले मेरे पिता काम के सिलसिले में उत्तर प्रदेश छोड़कर असम में बस गए थे। मेरा जन्म असम में ही हुआ। मैं बहुत छोटी थी, जब मेरी मां का देहांत हो गया था। असम में ही मेरी पहली शादी हुई। शादी के करीब एक साल बाद हमारा एक बेटा हुआ। मगर जल्द ही मेरे पति गुजर गए।
विज्ञापन


इस बीच मेरे पिता देवरिया के अपने पुश्तैनी गांव में रहने लगे थे। बेहद कम उम्र में विधवा होने के कारण पिता ने मुझे असम से देवरिया बुला लिया, ताकि वह मेरी दूसरी शादी करा सकें। मुझे भी अपने पिता का फैसला सही लगा। 2011 में मेरी दूसरी शादी हो गई। लेकिन यह फैसला मुझपर भारी पड़ गया। जिस सुखद जीवन की तलाश में मैंने शादी की थी, वह और दूभर हो गया। मैं दो साल में अपने दूसरे पति से अलग हो गई।

विज्ञापन
विज्ञापन

मेरे सामने अस्तित्व का संकट था

Struggling story of Nisha tiwari- become hawker for bright future of son

नारी सुधार गृह से निकलने के बाद मेरे सामने अस्तित्व का संकट था, क्योंकि मेरे पिता बूढ़े हो चले थे और वह गांव में ही रहते थे। थक-हार कर मैंने एक दुकान पर काम करने का फैसला किया। मुझ पर अपने बेटे के खर्च का भी बोझ था। मेरा बेटा अपनी दादी के साथ असम में रहता था, लेकिन बीच-बीच में मैं उसे देवरिया भी ले आती थी। बेटा बड़ा हो रहा था, जिससे बड़ी हो रही थीं उसकी जरूरतें। मैं जो कमाती थी, वह इतना नहीं था, जिससे खर्च चल सके।

नतीजतन मैं आमदनी बढ़ाने का प्रयास करने लगी। इसी कोशिश में मैंने अपने एक परिचित भैया से बात की। वह अखबार बांटने का काम करते थे। मैंने उनके सामने अखबार बांटने का काम करने का प्रस्ताव रखा। यह ऐसा काम था, जिससे मेरा दिन का काम प्रभावित नहीं होता। उन भैया की मदद से मेरे हॉकर बनने की सारी व्यवस्था हो गई। काम के पहले दिन सुबह चार बजे उठ कर अखबार की गड्डियों के साथ साइकिल से जब मैं निकली, तो मन में एक अजीब तरह की झिझक थी। मैं वह काम करने जा रही थी, जिसे लड़कियां नहीं करतीं। वर्षों की परंपरा को एकदम से तोड़ने में मुझे कुछ दिक्कतें आईं, लेकिन मुझे पता था कि यह काम बुरा नहीं है।

कुछ लोगों ने मेरा उपहास बनाया, तो कुछ लोगों मेरे हिम्मत की दाद दी। मैं हर सुबह चार घंटों में करीब डेढ़ सौ घरों तक अखबार पहुंचाती हूं। इसके लिए मुझे दर्जनों किलोमीटर साइकिल चलानी पड़ती है। उसके बाद पूरे दिन एक कपड़े की दुकान पर काम करती हूं। इस तरह से मेरी ड्यूटी सुबह चार बजे से रात आठ बजे तक चलती है। लेकिन सोलह घंटे का काम मैं खुशी-खुशी करती हूं, क्योंकि मैं अतिरिक्त कमाई से अपने बेटे को पढ़ा-लिखाकर अफसर बनाना चाहती हूं।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed