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मां की सलाह पर शुरू की 'दादी को रसोई', आज कई जरूरतमंदों को देती है भरपेट भोजन

Mon, 16 Apr 2018 01:42 AM IST
अनूप खन्ना
अनूप खन्ना Updated Mon, 16 Apr 2018 01:42 AM IST
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social activist anup khanna Dadi Ki Rasoi in Noida serves food in only Rs five
anoop khanna

चार साल पहले उस दिन मैं सड़क पर लगे ट्रैफिक जाम खत्म करने की कोशिश कर रहा था। जिस गाड़ी ने ट्रैफिक उलझाकर रखा था, उस गाड़ी के चालक को समझाने पर वह मुझसे बोला, तू कहीं का दारोगा लगता है क्या? उसकी बात सही थी। ट्रैफिक संभालना जिसका काम था, वह तो पेड़ के नीचे बैठ कर आराम फरमा रहा था।

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मैं मूलतः उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद से हूं। हापुड़ में पिता की नौकरी के सिलसिले में अस्सी के दशक में मैं नोएडा आ गया था। पिछले कई वर्षों से मैं यहां दवाइयों का काम करता हूं। मैं एक ऐसे परिवार से आता हूं, जहां देश-दुनिया से सरोकार रखना एक पुरानी परंपरा है। मेरे पिता ने गांधी जी के साथ स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया था। उसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए मैं समाज के लिए हर वह काम करता, जिसकी जरूरत मुझे दिखती। फिर चाहे वह प्राइवेट स्कूलों में बेइंतहा बढ़ रही फीस का मामला अदालत तक ले जाना हो या अस्पतालों को लावारिश लाशों के रख-रखाव के लिए जरूरी फ्रिज देने की बात हो। ये सभी काम मेरी संतुष्टि के विषय थे।
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एक दिन की बात है, मेरी मां ने, जिनके बूढ़े शरीर को बहुत कम खाने की जरूरत पड़ती है, मुझे एक सलाह दी। उन्होंने कहा कि बेटा, मैं तो बहुत कम खाना खाती हूं, क्यों न तुम मेरे हिस्से का खाना किसी जरूरतमंद को खिला दिया करो। मेरे बच्चों ने भी तपाक से अपनी दादी के प्रस्ताव में अपना समर्थन जोड़ दिया। समाज के लिए कुछ करने के लिए मुझे तो किसी दूसरी वजह की जरूरत थी ही नहीं। मैंने अपने दूसरे साथियों की मदद से अपनी दुकान के पास गरीबों का पेट भरने के लिए एक नई और अनूठी शुरुआत की, जिसका नाम दिया दादी की रसोई। मैंने पांच रुपये में गरीबों के लिए भरपेट भोजन की व्यवस्था की। 

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social activist anup khanna Dadi Ki Rasoi in Noida serves food in only Rs five

पांच रुपये इसलिए, क्योंकि मैं यह मानता हूं कि मुफ्तखोरी गलत है। खाना इतना सस्ता हो कि कोई भी खा सके और किसी इंसान का स्वाभिमान भी प्रभावित न हो। मेरा प्रयोग चल निकला। इस विशेष रसोई की शुरुआत करते हुए मैंने नहीं सोचा था कि यह कब तक चलेगी। मगर दिन भर सैकड़ों भूखों को पेट भर खाना खाते देख मैंने तय कर लिया कि यह रसोई अब बंद नहीं होगी और खाने की कीमत भी पांच रुपये ही रहेगी।

आगे चलकर मैंने गरीबों के लिए मात्र दस रुपये में कपड़े की भी व्यवस्था की। ये कपड़े मुझे लोगों द्वारा दान में मिलते हैं। मैं दान में मिले कपड़ों को बाकायदा ड्राई क्लीन कराकर पैक करके जरूरतमंदों को दस रुपये में मुहैया कराता हूं। इसके साथ हाल ही में मैंने नोएडा के एक दूसरे इलाके में प्रधानमंत्री जन औषधि योजना के अंतर्गत एक दवाखाने की स्थापना की है, जहां महंगी से महंगी दवाएं एक-दो रुपये में खरीदी जा सकती हैं।

इस तरह मैं गरीबों के लिए रोटी, कपड़ा और दवा जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए काम कर रहा हूं। अपने काम के लिए मुझे कभी भी आर्थिक परेशानी नहीं हुई। क्योंकि तमाम तरह की नकारात्मकता वाले समाज में ऐसे बहुत लोग हैं, जो कुछ न कुछ देना चाहते हैं। उन्हें तो बस सच्चे भरोसे की तलाश है। मैं मानता हूं कि आप कितने भी धनी व्यक्ति क्यों न हों, अगर आपके साथ किसी जरूरतमंद की दुआएं नहीं हैं, तो आप बहुत गरीब हैं। देश के दूसरे हिस्सों में भी कई अन्य लोगों ने भी काम का अनुसरण किया है।

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