पढ़ाई जितना ही जरूरी है खेलना: बच्चों के चेहरे पर मुस्कान लाने के लिए नौकरी छोड़ खोला खिलौना बैंक
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इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियरिंग करने के बाद मैं कॉरपोरेट नौकरी करने के साथ-साथ समाज के लिए कुछ करना चाहती थी। इसी सिलसिले में मैं मुंबई के एक स्थानीय एनजीओ से बतौर स्वयंसेवक जुड़ गई थी। मैं गरीब बच्चों को गणित सिखाने का काम करती थी, यह जिम्मेदारी एनजीओ ने मुझे दी थी।
लेकिन इस काम के कुछ ही हफ्ते भीतर मुझे एहसास हुआ कि बच्चे मेरी पढ़ाई से उत्साहित नहीं हैं। उन्हें गणित में कोई विशेष दिलचस्पी भी नहीं है। मैंने समझाने की कोशिश की, तो पता चला कि मेरे जैसे कई दूसरे शिक्षक भी उन्हें अलग-अलग विषय पढ़ाने आते हैं, और पढ़ाई की अधिकता के कारण उन्हें खेलने का वक्त नहीं मिल पाता था। मैं जिन्हें रिपोर्ट करती थी, उनसे अनुमति लेकर मैंने इन बच्चों को दूसरी गतिविधियों में शामिल किया। मैंने उनके सामने कई पुराने खेलों को नए तरीके से पेश किया। बहुत जल्द ही बच्चे मुझसे पूरी तरह घुल-मिल गए, क्योंकि अब मैं उनके लिए उबाऊ गणित शिक्षक के बजाय खेल खिलाने वाली दीदी थी।
पंद्रह अगस्त, 2004 का दिन था। पूरा दिन उल्लास के साथ स्वतंत्रता दिवस मनाने के बाद देर शाम को मैं अपने दोस्तों के साथ एक रेस्टोरेंट में खाना खा रही थी। खाना खाते वक्त मेरे दिमाग में एक आइडिया आया। मैंने सोचा कि आर्थिक रूप से सक्षम परिवारों में अक्सर कई पुराने खिलौने बेकार पड़े रहते हैं और गरीब बच्चे एक अदद खिलौने के लिए तरसते रहते हैं। मैंने यही चाहा कि कैसे भी अमीरों के लिए उन बेकार खिलौनों को गरीबों तक पहुंचाया जाए।
मैंने अपने साथियों की मदद से खिलौने इकट्ठा करने का एक अभियान चलाया। मुझे ताज्जुब हुआ कि जितना मैंने सोचा था, उससे कहीं ज्यादा खिलौने इकट्ठा हो गए। और जब मैंने इन खिलौनों को गरीब बच्चों में बांटा, तो उन बच्चों ने खिलौनों को अपने हाथों से ऐसे पकड़ा, जैसे तपती दोपहरी में किसी प्यासे को पानी मिल गया हो।
खिलौनों का बच्चों के व्यवहार पर खासा असर पड़ता है
मैं यह दृश्य देखकर बहुत खुश हुई, मैंने सोचा क्यों न इस काम को आगे बढ़ाया जाए। अगले कुछ वर्षों तक जीवन की शुष्क दिनचर्या में खिलौनों की ओस ने नमी बनाए रखी। एक योजना के मुताबिक, मैंने 2009 में अपनी नौकरी छोड़कर एक खिलौना बैंक खोला। 'टॉय बैंक' नाम से हमारी संस्था को अच्छे स्वयंसेवकों और नेक दिल ट्रस्टियों का साथ मिला।
मैंने बहुत करीब से महसूस किया है कि खिलौनों का बच्चों के व्यवहार पर खासा असर पड़ता है और ये हर बच्चे की जरूरत होते हैं। मुझे अच्छी तरह याद है कि शुरू में मैंने एक बच्चे को खिलौना बंदूक दी, तो उसने बंदूक हाथ में लेकर कहा कि मैं बड़ा होकर गुंडा बनूंगा। उसकी बात का सकारात्मक पहलू यही था कि खिलौने ने उसके दिमाग पर तुरंत प्रभाव छोड़ा।
मैं मानती हूं कि मैं कोई चैरिटी या महान काम नहीं कर रही हूं। मैं तो एक माध्यम की मदद से उन बच्चों को उनका हक दिलाने की कोशिश करती हूं, जो कि गलत सामाजिक व्यवस्था ने उनसे छीन ली है। पिछले कई वर्षों में हमारे बैंक ने हजारों बच्चों तक खिलौने पहुंचाने का काम किया है। आज हमारा दायरा सिर्फ मुंबई में ही नहीं, बल्कि बंगलूरू, पुणे, दिल्ली जैसे दूसरे महानगरों तक फैल चुका है। कई लोग हैं, जो ऐसा ही काम करना चाहते हैं। मेरी उनको सलाह है कि जुनून पैदा करने के लिए पहले उन्हें एक स्वयंसेवक की तरह काम करना चाहिए।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।