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'कीमती कंगन बेचकर जाना औरत का दुख'

Mon, 27 Aug 2018 04:19 PM IST
मंदादी श्रव्या रेड्डी
मंदादी श्रव्या रेड्डी Updated Mon, 27 Aug 2018 04:19 PM IST
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shravya reddy mandadi- founder of Ngo We and she work in rescue in telangana
मंदादी श्रव्या रेड्डी

मैंने हर इलाके की भौगोलिक स्थिति के बारे में अध्ययन किया। विकास के तमाम पैमानों को समझा। और पिछली पहली जुलाई को मैं हैदराबाद से चुपचाप बिना कोई अतिरिक्त प्रचार किए मेमू आमे कोसम (वी फॉर हर) के तहत इक्कतीस दिनों में राज्य के सभी जिलों की यात्रा पर निकली थी। तेलंगाना के 31 जिलों की एक हजार महिलाओं से मिलने के बाद मैं अपने अनुभवों के आधार पर उन महिलाओं की समस्याओं के समाधान की ओर बढ़ रही हूं। मैं एक कंप्यूटर इंजीनियर ग्रैजुएट हूं।

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बहुत पहले से ही मैं कई तरह के गैर सरकारी संगठनों से जुड़कर समाज के लिए काम करती रही हूं। पिछले साल मैंने वी फॉर हर नाम से खुद का एनजीओ शुरू कर दिया। मेरी संस्था उन महिलाओं के लिए काम करती है, जो अपने विफल दांपत्य जीवन के बाद तमाम तरह की सामाजिक मुश्किलों का सामना कर रही होती हैं। मैं ऐसी कई महिलाओं से मिली हूं, जिनकी जिंदगी उजड़ चुकी है और वे कहीं से किसी भी प्रकार की उम्मीद की तलाश में हैं।
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मैं अदीलाबाद में एक अधेड़ महिला से मिली, जिसने अब तक दो हजार रुपये का नोट नहीं देखा था। मैंने दलितवाड़ा में रहने वाली सक्कूबाई बंडारू का भी घर देखा है, जो सिर्फ दो दीवारों का ढांचा भर था, क्योंकि बारिश में घर की छत नीचे गिर गई थी। ऐसे कई मौके रहे, जब मैंने एक ही दिन में जिले के दर्जन भर गांवों का दौरा किया। मैं एक गांव में कम से कम एक घंटा जरूर रुकती थी। मैं सीनियर स्कूलों में पढ़ने वाली लड़कियों से भी मिली। उत्तनूर में मुझे कुछ लड़कियों ने अपनी बहनों के बारे में बताया, जिनकी शादियां किसी वजह से टूट चुकी थीं। कई जिलों में मुझे वे औरतें भी मिलीं, जो स्वरोजगार के जरिये अपनी जिंदगी दोबारा पटरी पर ला चुकी हैं।

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 ऐसी ही औरतों के अनुभवों ने मुझे असहाय महिलाओं के लिए काम करने के लिए प्रेरित किया। यदाद्री जिले की बुनकर महिलाओं से मिलने पर मुझे पता चला कि उनकी बुनी साड़ी, जिसकी लागत कीमत एक हजार से पांच हजार के बीच होती है, वह कैसे शॉपिंग मॉल में कम से कम बीस हजार रुपये की बेची जाती है। ऐसी ही महिलाओं के लिए मैंने योजना बनाई है कि मैं इन्हें वह रास्ता दिखाऊं, जो उन्हें बड़े बाजार की ओर ले जाए, ताकि उन्हें अपनी मेहनत की सही कमाई मिल सके।

मुझे पता है कि इन महिलाओं के पास इतने पैसे नहीं है कि वह शहर तक जाकर किसी स्टॉल पर अपना माल बेच सकें, इसलिए मैं इनके आने-जाने के लिए बस का इंतजाम करने के लिए तैयार हूं। हर जिले के भ्रमण में मेरे दो लाख रुपये खर्च हुए, जिसकी व्यवस्था के लिए मैंने अपना कीमती कंगन बेच दिया था। वह कंगन मुझे जन्मदिन पर उपहार में मिला था। इस लंबी यात्रा के बाद जब मैं घर लौटी, तो हर किसी ने धूप से झुलस चुकी मेरी त्वचा पर टिप्पणी की।

मगर मेरे लिए वे टिप्पणियां गर्व का विषय थीं। मेरा काम अभी अधूरा है। मैं अपनी पूरी यात्रा के दस्तावेज प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और दूसरे सरकारी अधिकारियों तक पहुंचाऊंगी, ताकि इनकी समस्याओं का उचित समाधान भी निकले। मेरी कोई राजनीतिक पृष्ठभूमि नहीं है और न ही मैं कोई एक्टिविस्ट हूं। मैं एक सामान्य युवती हूं, जो दूसरी महिलाओं की मदद के लिए हमेशा तत्पर है।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।

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