फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Bashindey ›   Shantuben Patel- Pediatrician Who Runs Dhanvantri School For Mentally And Physically Challenged Kids

इलाज के लिए आए बच्चों के लिए खोल दिया धनवंतरी नाम से एक विशेष स्कूल

Wed, 22 Aug 2018 02:53 PM IST
शांतुबेन पटेल
शांतुबेन पटेल Updated Wed, 22 Aug 2018 02:53 PM IST
विज्ञापन
Shantuben Patel- Pediatrician Who Runs Dhanvantri School For Mentally And Physically Challenged Kids
शांतुबेन पटेल

पुरानी बात है, वह नीदरलैंड्स में रहती थीं। उस दिन उनकी मां ने फोन पर उनसे बात कराई थी। बातचीत के दौरान मैंने उन्हें बताया कि मैं डॉक्टर के साथ एक विपश्यना टीचर भी हूं। मैंने उनसे कहा कि मैं जब भी आपके घर आती हूं, दीवार पर टंगी आपकी तस्वीर मुझे आकर्षित करती है। बातचीत के आखिर में मैंने उन्हें कच्छ में चल रहे अपने स्कूल में आने के लिए आमंत्रित किया। एक सात्विक प्रकार का लालच देते हुए मैंने कहा कि मरुभूमि की शांति आपको पसंद आएगी, साथ ही मेरे स्कूल के बच्चों की अनोखी ऊर्जा भी आपको जरूर आकर्षित करेगी। उन्हें मेरी बातों ने प्रभावित किया, लेकिन भारत आने की योजना को उन्होंने वक्त पर छोड़ दिया।

विज्ञापन


यूरोपियन कमीशन रिसर्च एक्जेक्यूटिव एजेंसी के लिए काम कर रही एक स्वतंत्र विशेषज्ञ अमृता मेहता को मैंने खास उद्देश्य के लिए भारत बुलाया था। आज वह हमारे स्कूल बोर्ड की पैनलिस्ट हैं। इसी प्रकार मैंने अनेक काबिल लोगों को अपने बच्चों की जरूरतों के हिसाब से अपने स्कूल से जोड़ा है। वे यहां आते हैं और अपने अनुभवों के आधार पर इन बच्चों को काफी-कुछ सिखा जाते हैं।
विज्ञापन


सत्तर के दशक में मैंने भी यूरोप में काम किया है। ब्रिटेन में नियो-नैटोलॉजिस्ट (नवजातों का देखभाल करने वाला) के तौर पर काम करते हुए उस दिन के केस ने मेरे जीवन पर काफी असर डाला। हुआ कुछ यों था कि एक नाबालिग मां का बच्चा लिवरपूल अस्पताल में भर्ती हुआ था। यह वही अस्पताल था, जहां मैं काम करती थी। बाइटेम्पोरल हैमरेज (देखने में परेशानी) का शिकार उस बच्चे की जान जोखिम में थी। आनन-फानन में उसे अस्पताल तक एयरलिफ्ट करके लाया गया था।

विज्ञापन
विज्ञापन

मैंने उसे बचाने में अपना सब कुछ झोंक दिया। खुशकिस्मती से एक हफ्ते के इलाज के बाद वह ठीक होने लगा। उस घटना के बाद मुझे कम से कम यह समझ आ गया कि किसी की भी जान सिर्फ जान होती है। कोई फर्क नहीं पड़ता कि उस बच्चे की पृष्ठभूमि क्या थी। जल्द ही मुझे वहां एक ऐसे अस्पताल में काम करने का अवसर प्राप्त हुआ, जो मुफ्त सेवाएं प्रदान करता था।

कुछ वक्त बाद मैं भारत लौट आई और अपने गृह राज्य गुजरात के कच्छ में प्रैक्टिस शुरू कर दी। यहां काम करने के दौरान हर दिन मेरा सामना कुछ विशेष बच्चों से होता था। लोग अपने बच्चे को ठीक कराने मेरे पास आते। मुझे जरूरत महसूस हुई और जल्द ही मैंने उन बच्चों के लिए धनवंतरी नाम से एक विशेष स्कूल खोल दिया। शुरू में स्कूल उनके लिए ही था, जिन्हें सुनने में दिक्कत थी। आगे चलकर स्कूल का दायरा उन विशेष बच्चों तक पहुंच गया, जो मानसिक रूप से अक्षम होते हैं।

इस स्कूल में मेरे अलावा विशेष शिक्षकों की पूरी टीम काम करती है। ये टीम केवल कक्षा के भीतर ही काम नहीं करती, बल्कि वहां से बाहर निकलकर समुदायों, गांवों और घरों तक पहुंचकर उन्हें कुछ न कुछ सिखा रही है। हम प्रत्येक बच्चे के अभिभावकों तक पहुंचते हैं, उन्हें बताते हैं कि वे कैसे अपने बच्चे को बेहतर तरीके से पाल सकते हैं। इन विशेष बच्चों की चुनौतियों के मद्देनजर उनकी जरूरतों का सही आकलन करके उनके घरवालों को जागरूक बनाया जाता है। इस स्कूल के सुचारु संचालन के लिए हर साल लाखों रुपयों का खर्च आता है। अच्छी बात यह है कि इसकी पूर्ति अनेक भले दानदाताओं से हो जाती है।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed