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कागज के थैले बनाने से प्रसिद्ध चित्रकार बनने तक का सफर, खुद बयां की अपने संघर्ष की कहानी

शकीला शेख Updated Sat, 08 Sep 2018 02:00 PM IST
Shakila Sheikh- Poverty women Discovered Her Talent and now known Internationally Artist
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अड़तालीस वर्ष पहले मेरा जन्म पश्चिम बंगाल के 24 परगना जिले में हुआ था। अपने कुल छह भाई-बहनों में मैं सबसे छोटी हूं। मैंने चलना भी नहीं सीखा था, जब मेरे पिता परिवार छोड़कर बांग्लादेश चले गए थे। मां ने परिवार चलाने के लिए सब्जी बेचना शुरू कर दिया। वह रोजाना चालीस किलोमीटर का सफर तय करके कोलकाता सब्जी बेचने जाती थीं। मां मुझे घुमाने के लिए अपने साथ शहर ले जाती थीं। दरअसल मुझे कोलकाता की सड़कों पर चलने वाली ट्राम और बसों को देखना पसंद था। मुझे याद है कि कई मर्तबा जब मां सब्जी बेच रही होती थीं, मैं वहीं फुटपाथ पर सो जाती थी।
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फिर एक दिन मेरी जिंदगी में एक अहम मोड़ आया। वहां के एक स्थानीय समाजसेवी और चित्रकार बलदेव राज पनेसर हर रोज सब्जियां खरीदने आते थे। वह मेरी मां  से ही सब्जी खरीदते थे। गरीब बच्चों को चॉकलेट, अंडे, पेंसिल, पत्र-पत्रिकाएं बांटते रहना उनकी पहचान थी। बंगाली में अंडे को डिंब कहते हैं, इसलिए बच्चे उन्हें प्यार से डिंबबाबू पुकारते थे। उस दिन डिंबबाबू ने मुझे भी चॉकलेट व अंडे देने की कोशिश की। लेकिन मां की सीख के मुताबिक, मैं किसी अनजान व्यक्ति से कुछ भी नहीं लेती थी।

मेरे अनुशासन से पनेसर बाबा प्रभावित हुए। किसी दूसरे दिन वह फिर आए और उन्होंने मेरी मां से मुझे स्कूल भेजने की बात कही। मेरी मां मान गई। हालांकि सात साल तक गांव में रहने के बाद शहर में पढ़ाई की शुरुआत करना मेरे लिए बहुत आसान नहीं था। फिर भी मैंने बाबा के रहमोकरम से थोड़ी-बहुत बांग्ला जरूर सीख ली। एक ओर बाबा मेरी जिंदगी बेहतर बनाने में जुटे थे, दूसरी ओर उन्हें बताए बगैर मां ने बारह साल की उम्र में मेरी शादी कर दी। मेरी शादी एक ऐसे शख्स से कर दी गई थी, जिसकी अपनी समस्याएं थीं।
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