'मैं अपने छोटे-छोटे कामों से समाज में बदलाव लाने की कोशिश करती रहती हूं'
अट्ठाइस साल पहले की बात है। मैं उस वक्त चौथी कक्षा में थी। छुट्टियां बिताने मैं बिहार के दाउदनगर स्थित अपने पैतृक गांव गई थी। गांव में एक दिन मैंने देखा कि लोगों का समूह एक अधेड़ व्यक्ति को रस्सी से बांधकर बहुत निर्ममता से पीट रहा है। पीटने वाले समूह में मेरे परिवार के सदस्य भी शामिल थे। पिटने वाला शख्स चिल्ला-चिल्लाकर रो रहा था और लोगों से छोड़ने की फरियाद किए जा रहा था।
लेकिन साइकिल चुराने के अपराध को भीड़ इतना कम नहीं समझ रही थी कि वह उस अधेड़ को बख्श दे! पास में खड़ी होकर मैं यह पूरा नजारा देख रही थी। अचानक उस आदमी के रोने की आवाज मेरे कानों में कुछ ज्यादा ही तेजी से सुनाई देने लगी। मैं दौड़ती हुई भीड़ के पास गई और लोगों से उस आदमी को छोड़ने की विनती की। मगर 'अपराध के शोर' के आगे मेरी विनती फीकी पड़ रही थी। फिर मैंने उस रस्सी के सिरे को अपने गले में बांध लिया, जिस रस्सी से उस आदमी को बांधा गया था।
मेरी तरकीब काम आई। भीड़ की हरकत थम गई और आरोपी मेरे पैर पकड़ कर वहीं गिर गया। वह मेरी तरफ कृतज्ञता भरी नजरों से देख रहा था। उस पल को याद करके मैं आज भी विजयी मुद्रा में आ जाती हूं, पर यह भी सोचने लगती हूं कि हमारा समाज कितना असंवेदनशील होता जा रहा है। मेरे जीवन में यह पहली घटना थी, जिसने मुझे एहसास कराया कि मैं भी कुछ कर सकती हूं।
गरीब बच्चों के बीच बहा रही ज्ञान की सरिता
मैं मूलतः बिहार से हूं, पर पिता की वन विभाग में नौकरी के कारण मेरा बचपन देश के पूर्वोत्तर राज्यों में बीता है। 2003 में एक वकील से मेरी शादी हो गई और मैं बिहार में अपने ससुराल में एक सामान्य गृहिणी की तरह रहने लगी। बिहार आकर मैंने वकालत की तालीम हासिल की और इसी क्षेत्र में करियर बनाने के बारे में सोचने लगी। मैं आसपास के लोगों से मिलती रहती थी। मैं जहां रहती थी, वहां की लड़कियों का निम्न शैक्षणिक स्तर देख कर मुझे हैरानी होती।
मुझे लगा कि मैं अपने आास-पड़ोस की लड़कियों को अंग्रेजी की कोचिंग दे सकती हूं। यही सोचकर मैंने घर पर ही कोचिंग शुरू कर दी। धीरे-धीरे मेरी कोचिंग की लोकप्रियता बढ़ने लगी और मुझे भी बच्चों को पढ़ाने में आनंद आने लगा। मैंने इसी काम के जरिए समाज को कुछ देने का निर्णय लिया। पुष्पा नाम की अपनी छात्रा को मैं कैसे भूल सकती हूं, जो एक बेहद गरीब परिवार से आती थी। मेरी मदद की बदौलत उसने बैंक की नौकरी हासिल की और अपने परिवार का सहारा बनी।
आगे चलकर मैंने घर से अलग एक पृथक कोंचिग सेंटर खोल दिया। शुरू में शुल्क लेकर पढ़ाने के काम को मैंने जरूरतमंद गरीब बच्चों के लिए निःशुल्क कर दिया। आगे चलकर मैंने अपने ही पढ़ाए छात्र-छाआओं के समूह बनाकर उन्हें झुग्गियों में रहने वाले गरीब बच्चों के परिवारवालों को समझाने के लिए भेजना शुरू किया। मेरे प्रयासों को सफलता मिली और देखते ही देखते मैंने सैकड़ों बच्चों को शिक्षा से जोड़ दिया।
चूंकि मेरे पास कानूनी जानकारी भी है, इसलिए मैं समाज के गरीब जरूरतमंदों की विधिक मदद भी करती रहती हूं। कुछ वक्त पहले मैं एक नाबालिग बलात्कार पीड़िता को न्याय दिलाने के लिए समाज और पूरी व्यवस्था से सफलतापूर्वक लड़ चुकी हूं। मैंने कोई बड़ा काम नहीं किया है। मैं तो बस अपने छोटे-छोटे कदमों से समाज में बदलाव लाने की कोशिश करती रहती हूं।