'मैं अपने छोटे-छोटे कामों से समाज में बदलाव लाने की कोशिश करती रहती हूं'

सरिता राय Updated Fri, 18 May 2018 09:52 AM IST
Sarita Rai
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अट्ठाइस साल पहले की बात है। मैं उस वक्त चौथी कक्षा में थी। छुट्टियां बिताने मैं बिहार के दाउदनगर स्थित अपने पैतृक गांव गई थी। गांव में एक दिन मैंने देखा कि लोगों का समूह एक अधेड़ व्यक्ति को रस्सी से बांधकर बहुत निर्ममता से पीट रहा है। पीटने वाले समूह में मेरे परिवार के सदस्य भी शामिल थे। पिटने वाला शख्स चिल्ला-चिल्लाकर रो रहा था और लोगों से छोड़ने की फरियाद किए जा रहा था।
लेकिन साइकिल चुराने के अपराध को भीड़ इतना कम नहीं समझ रही थी कि वह उस अधेड़ को बख्श दे! पास में खड़ी होकर मैं यह पूरा नजारा देख रही थी। अचानक उस आदमी के रोने की आवाज मेरे कानों में कुछ ज्यादा ही तेजी से सुनाई देने लगी। मैं दौड़ती हुई भीड़ के पास गई और लोगों से उस आदमी को छोड़ने की विनती की। मगर 'अपराध के शोर' के आगे मेरी विनती फीकी पड़ रही थी। फिर मैंने उस रस्सी के सिरे को अपने गले में बांध लिया, जिस रस्सी से उस आदमी को बांधा गया था।

मेरी तरकीब काम आई। भीड़ की हरकत थम गई और आरोपी मेरे पैर पकड़ कर वहीं गिर गया। वह मेरी तरफ कृतज्ञता भरी नजरों से देख रहा था। उस पल को याद करके मैं आज भी विजयी मुद्रा में आ जाती हूं, पर यह भी सोचने लगती हूं कि हमारा समाज कितना असंवेदनशील होता जा रहा है। मेरे जीवन में यह पहली घटना थी, जिसने मुझे एहसास कराया कि मैं भी कुछ कर सकती हूं।
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