'मैंने अनुभव किया कि दूसरों की मदद करने से पहले हमें खुद को मजबूत बनाना जरूरी है'
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मैं उस वक्त एमबीबीएस की पढ़ाई कर रही थी। मुझे हमेशा यही लगता कि पढ़ाई तो ठीक है, पर मुझे कुछ और भी करना चाहिए। संयोग से मुझे एक ऐसी संस्था के साथ काम करने का मौका मिल गया, जो वेश्यावृत्ति से जुड़ी महिलाओं के पुनर्वास हेतु काम कर रही थी।
काम के पहले ही चरण में मुझे ग्यारह साल की एक लड़की का मामल सौंप दिया गया। वह लड़की खाना-पीना छोड़ दुनिया से कटी-कटी रहने लगी थी। एक कोने में चुपचाप बैठी रहने वाली उस लड़की से कई लोगों ने बात करने की कोशिश की थी, पर वे विफल रहे। मैंने भी घंटों उसके सामने बैठकर उससे बात करने का प्रयास किया। मगर वह टस से मस नहीं हुई। मैंने उससे अपना लंच साझा किया, तो एक अल्प ठहराव के बाद उसने मेरा खाना स्वीकार कर लिया।
उसने मुझसे बात की, तो पता चला कि वह एचआईवी संक्रमित है। मैं भी उस वक्त केवल उन्नीस साल की थी, पर मुझे उस दिन एक जिम्मेदारी का एहसास हुआ। मुझे लगा कि उस बच्ची को अर्थिक मदद की जरूरत है, जिसे मैं पूरी कर सकती हूं। और फिर बहन या बेटी, कोई भी रिश्ता कह लें, मैंने उसे आर्थिक तौर पर गोद ले लिया।
डॉक्टरी की पढ़ाई पूरी करने के बाद अपने तमाम दोस्तों की तरह मैंने भी एक नामी कॉरपोरेट अस्पताल में काम करना शुरू कर दिया। अभी जुमा-जुमा आठ दिन ही बीते होंगे कि मुझे एहसास हुआ कि मैं इस तरह काम करने के लिए नहीं बनी हूं। वहां मुझे एक बने-बनाए परंपरागत ढर्रे पर चलना था। चूंकि एचआईवी/एड्स संक्रमित एक रोगी से मेरा जुड़ाव पुराना हो चुका था, इसलिए मेरा मन बार-बार ऐसे ही जरूरतमंदों की ओर आकर्षित हो रहा था।
आखिरकार काम करने के लिए मैंने एक ऐसी संस्था ढूंढ ली, जो इस क्षेत्र में काम कर रही थी। मुझे नए काम के लिए पिछली नौकरी से सत्तर फीसदी कम तनख्वाह मिलनी तय हुई, मगर मैंने इस बात की परवाह नहीं की, क्योंकि मुझे इस काम में संतुष्टि की उम्मीद थी। यहां काम करते हुए मुझे भारत भ्रमण का मौका मिला। इस दौरान मैं लोगों की मदद के लिए यूनिसेफ के कार्यक्रमों समेत कई अन्य अभियानों का हिस्सा बनी।
इसी तरह एक अच्छा खासा वक्त बिताने के बाद मुझे एक जरूरी बात पता चली। मैं एक तरह से स्वयंसेवक का काम कर रही थी। यह सही काम था, पर केवल इससे काम नहीं चलने वाला था। जरूरतमंदों तक उचित मदद पहुंचाने के लिए फंड इकट्ठा करना आवश्यक था। मेरे कई सलाहकारों ने मुझे बताया कि मैं समाज में यदि वास्तविक बदलाव लाना चाहती हूं, तो मुझे पैसे तो चाहिए ही। पैसे कमाने के लिए मैं दोबारा डॉक्टरी नहीं करना चाहती थी, इसलिए मैंने फिर से पढ़ने का निर्णय लिया और परिवार वालों की मदद से मार्केटिंग में एमबीए पूरा किया। जल्द ही मैं एक कंपनी की सहायक निदेशक बन गई।
मैं अभी तीस साल से कम उम्र की हूं, लेकिन मैंने जिंदगी के कई सबक सीख लिए हैं। मैंने अनुभव किया है कि दूसरों की मदद करने से पहले हमें खुद को मजबूत बनाना जरूरी है। ताउम्र समझौते करने के बजाय आप अपनी निजी और सामाजिक जिंदगी में एक संतुलन बना सकते हैं। मैं फिलहाल यही कर रही हूं और खुद की जिंदगी में अपनी अहमियत को साबित करते हुए तमाम दूसरे जरूरतमंदों की मदद करती रहती हूं।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।