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'जरूरतमंदों की मदद करने से मेरे मन को संतुष्टि मिलती है'

Tue, 10 Jul 2018 04:23 PM IST
रमेश जी मेहरोत्रा
रमेश जी मेहरोत्रा Updated Tue, 10 Jul 2018 04:23 PM IST
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Ramesh Mehrotra work for needy people, inspired with elder brother

मेरे पिता पुलिस अधिकारी थे। लेकिन उनकी असामयिक मृत्यु के बाद मैं पढ़ाई छोड़कर व्यापार के काम में लग गया। मेरा रेडिमेड कपड़ों का थोक का कारोबार है। इसके अलावा जूते

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का कारोबार भी है। यह ठीक है कि मैंने अपने जीवन में वैसी गरीबी नहीं देखी, लेकिन गरीबों के लिए कुछ करने की भावना मुझमें छोटी उम्र से ही थी। मेरा परिवार इस काम में सक्रिय रहा है। मेरे बड़े भाई, जो इलाहाबाद में खत्री सभा के अध्यक्ष थे, गरीबों की सहायता करने में हमेशा आगे रहते थे-जैसे कभी किसी गरीब बेटी की शादी करवा देना या किसी के घर में अनाज की व्यवस्था करवा देना आदि।
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उन्हीं से मुझे सेवा भावना की प्रेरणा मिली। वर्षों पहले जरूरतमंदों के लिए काम करने वाले कपिल सहगल जी से मुलाकात हुई, तो उस मुलाकात को दोस्ती में बदलते देर न लगी। वह गरीब बच्चों की पढ़ाई की व्यवस्था करने के अलावा गरीब लड़कियों की शादियां भी करवाते हैं और संगम तट पर पक्षियों के लिए चारे की भी व्यवस्था करते हैं। मैं लंबे समय तक इस पुनीत काम में उनकी आर्थिक मदद करता रहा। मुझे कई बार लगता था कि परोपकार का ऐसा कोई काम मैं खुद अपने स्तर पर भी शुरू कर सकता हूं। आखिरकार कपिल जी की प्रेरणा से मैंने नवंबर, 2016 से गरीबों को अनाज बांटने का काम शुरू किया।
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इसके तहत हर महीने के पहले या दूसरे रविवार को गरीबों को अनाज के पैकेट दिए जाते हैं। पांच किलो के इस पैकेट में चावल, दाल, तेल, चीनी, चाय और मसाले होते हैं। यह काम मैं अपने घर से ही करता हूं। हम अपने स्तर पर गरीबों की पहचान करते हैं। अमूमन दुकानों में काम करने वाले तथा विधवाओं और वृद्धों को यह मदद दी जाती है। मैं हर महीने ऐसे करीब चालीस पैकेट बांटता हूं, हालांकि कभी-कभी लोग ज्यादा भी हो जाते हैं। पर मैं जरूरतमंदों को कभी लौटाता नहीं। उदाहरण के लिए, इसी महीने एक ऐसी गरीब लड़की के बारे में पता चला, जो काम करने के अलावा पढ़ाई भी करती है। पता चला कि उसे मदद की आवश्यकता है।

लिहाजा हमने उसे भी मदद दी। बुजुर्ग महिलाएं और दिव्यांग, जो अनाज खुद नहीं ले जा सकते, पैकेट उनके घर पर भेज देने की व्यवस्था है। मेरे इस काम में सहयोगी व्यापारी बहुत मदद करते हैं। मैं जिनसे माल खरीदता हूं, और जिन व्यापारियों को बेचता हूं, वे नियमित रूप से हमारी मदद करते हैं। इस काम में मुझे पैसों की कमी आज तक महसूस नहीं हुई। दरअसल कमी पैसे की नहीं है। इसके लिए जुनून होना चाहिए। व्यापारी बंधु खुले हाथों से मेरे इस काम में सहयोग करते हैं।

कपिल सहगल जी भी अनाज के पैकेट भिजवाते हैं। इसके अलावा जितने पैसे की आवश्यकता होती है, वह मैं खुद खर्च करता हूं। छिहत्तर की उम्र में भी परोपकार के इस काम में मुझे ऊर्जा मिलती है। मैंने यह अभियान कोई लाभ या प्रचार पाने के लिए शुरू नहीं किया है, बल्कि यह काम मैं नि:स्वार्थ भाव से करता हूं। जरूरतमंदों की मदद करने से मेरे मन को संतुष्टि मिलती है। संतोष की बात यह भी है कि इस नेक काम में मेरे परिवार के लोग भी मेरे साथ हैं।

इस काम में समय के अलावा मैं पैसा भी खर्च करता हूं, लेकिन परिवार के लोगों ने कभी इस पर आपत्ति नहीं की। बल्कि वे मेरी इस मुहिम से खुश हैं। गरीबों को अनाज बांटने का यह काम बंद नहीं होगा, बल्कि मेरे बाद मेरे बेटा इसे जारी रखने की बात कह चुका है।

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