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Hindi News ›   Bashindey ›   Raman Deka- Deadly ULFA Militant Now Transforming People Lives in Assam

उग्रवाद छोड़कर बना पूरे गांव का चहेता, आश्रम के वातावरण से बदल गई जीवन शैली

Thu, 05 Apr 2018 12:45 AM IST
रमन डेका
रमन डेका Updated Thu, 05 Apr 2018 12:45 AM IST
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Raman Deka- Deadly ULFA Militant Now Transforming People Lives in Assam
Ramen Deka

46 साल पहले असम के दरंग जिले के एक बहुत ही गरीब परिवार में मेरा जन्म हुआ था। जब मैं मुश्किल से दो साल का था, मेरे पिता की मौत हो गई। गरीबी की यातनाओं ने मुझे बचपन में ही गुस्सैल स्वभाव का बना दिया। किशोरावस्था में ही मैं उग्रवादी संगठन- उल्फा के प्रभाव में आ गया और बारहवीं की परीक्षा देने के बाद उसकी गतिविधियों से जुड़ गया। मुझे उग्रवादी नेताओं का भरोसा जीतने में वक्त नहीं लगा और जल्द ही मैं उल्फा का क्षेत्रीय मुख्य सचिव बन गया।

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मैं संगठन में अपनी धाक बढ़ा ही रहा था कि 1993 में सेना द्वारा पकड़ लिया गया। एक साल तक कैद में रहने के बावजूद मेरे दिमाग से उल्फा का भूत उतरा नहीं। जेल से छूटने के बाद मैंने दोबारा उग्रवादी गतिविधियां शुरू कर दीं। ज्यादा तबाही के लिए इस बार मैंने तीन महीने का विशेष प्रशिक्षण भी लिया। कुछ वर्ष बाद मुझे दोबारा पकड़ लिया गया। इस बार पकड़ने वाले असम पुलिस के जवान थे। यह वही वक्त था, जब कई उग्रवादी समर्पण करके मुख्यधारा में शामिल हो रहे थे।
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मुझे एक पुलिस अधिकारी का सहयोग मिला और मैंने भी उस साल पंद्रह अगस्त को आत्मसमर्पण करने का आधिकारिक फैसला किया। इसका फायदा मुझे तुरंत मिला और मात्र तीन महीने की जेल के बाद मुझे रिहा कर दिया गया। आत्मसमर्पण के बदले पुलिस ने मुझसे मेरे पुनर्वास से जु़ड़े अनेक वायदे किए थे। लेकिन मैं आश्चर्यचकित था कि काफी वक्त बीत जाने के बाद भी कुछ नहीं हुआ। इस धोखे से मैं मानसिक रूप से परेशान हो गया।

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उग्रवाद छोड़ने के बावजूद समाज में लोग मुझसे डरते थे

Raman Deka- Deadly ULFA Militant Now Transforming People Lives in Assam

उग्रवादी साये के चलते मुख्यधारा के समाज में मेरे लिए अपनी जगह ढूंढ पाना मुश्किल हो रहा था। उग्रवाद छोड़ने के बावजूद समाज में लोग मुझसे डरते थे। उनका डर जायज था, कई मौकों पर मेरे जैसे उग्रवादियों की वजह से निर्दोष व्यक्तियों को भी पुलिस की प्रताड़ना झेलनी पड़ी थी। सामाजिक अस्वीकार्यता के बावजूद मैंने दोबारा उल्फा से जुड़ने का विचार नहीं किया, क्योंकि मैंने बहुत ईमानदारी से समर्पण किया था। मेरे दिमाग पर दबाव बढ़ता जा रहा था, जिससे राहत ढूंढने के प्रयास में मुझे शराब की लत लग गई।

वर्षों तक ऐसे ही जिल्लत भरा सिलसिला चलता रहा। एक दिन मेरे ही जैसे एक पूर्व उग्रवादी ने मुझे सरकार से अपना हक मांगने की सलाह दी। मैंने आवेदन किया, तो एक लंबे वक्त के बाद मुझे सरकारी पत्र मिला, जिसमें मुझसे मेरे जैसे लोगों की सूची मांगी गई थी। मैंने सब कुछ वैसा ही किया, जैसा मुझसे कहा गया। फलस्वरूप मुझे 220 पूर्व उल्फा सदस्यों के साथ प्रशिक्षण के लिए आर्ट ऑफ लिविंग आश्रम भेजा गया। मुझे उस वक्त भी सरकार की मंशा पर शक हुआ कि आश्रम में भेजकर हमारा पुनर्वास कैसे होगा? पर मेरी आशंका गलत निकली। आश्रम के वातावरण ने मुझ पर गहरा असर डाला।

ध्यान आदि की मदद से मैंने न सिर्फ शराब पर काबू पाया, बल्कि मानसिक रूप से इतना मजबूत हो गया कि वापस गांव लौटकर मैंने दूसरों के लिए शिविर का आयोजन किया। लोग मेरा बदला स्वरूप देखकर चकित थे। मगर आज मुझे देखकर कोई चकित नहीं होता है, क्योंकि विभिन्न सामाजिक कार्यक्रमों की मदद से मैं पूरे गांव का चहेता बन गया हूं। उल्फा से जुड़ने के वक्त लोग डर की वजह से मेरा सम्मान करते थे, लेकिन अब मेरे प्रति सम्मान में उनका प्यार देखा जा सकता है।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।

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