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'मानव तस्करी को खत्म करते हुए महिलाओं को आजाद कराना है मेरा लक्ष्य'

Wed, 25 Apr 2018 03:06 PM IST
रमा देवी
रमा देवी Updated Wed, 25 Apr 2018 03:06 PM IST
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Rama Devi was Trafficked, sexually exploited in teen age, now helps and rescues others
Rama Devi

मेरी रजामंदी का कोई सवाल ही नहीं था। और न ही मेरा दिमाग इतना विकसित हुआ था कि मैं अपना भला-बुरा समझ पाती। मुश्किल से तेरह-चौदह साल की उम्र में मेरी शादी कर दी गई। हालांकि आंध्र प्रदेश के कडप्पा जिले के जिस इलाके से मैं हूं, वहां यह कोई असामान्य घटना नहीं थी। अगर कुछ सामान्य नहीं था, तो वह था ससुराल वालों का मेरे प्रति व्यवहार।

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ससुराल पहुंचने के पहले दिन से मुझे अनेक यातनाओं का सामना करना पड़ा। मेरा पति मुझसे बेहद क्रूरता से पेश आता था। मेरी गर्भावस्था में भी वह मुझे पीटता था। पंद्रह की उम्र में मैंने एक बेटी को जन्म दिया। मुझे लगा कि शायद ससुराल वाले एक मां को सताना बंद कर देंगे। पर मैं गलत थी, उनकी प्रताड़नाओं में कोई कमी नहीं आई। आखिरकार अमानवीयता की पराकाष्ठा वाले उस माहौल को छोड़कर मैं अपने मजदूर मां-बाप के पास मायके आ गई। ससुराल वालों को मेरे फैसले से कोई फर्क नहीं पड़ा।
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मायके में मां-बाप दिन भर मजदूरी करते थे और मैं अपनी नवजात बच्ची के साथ अकेली घर पर रहती। घर के पास रहने वाली एक लड़की से मेरी दोस्ती हो गई। पड़ोस में ही मेरी मां की उम्र की दो महिलाएं भी रहती थीं, जिन्हें मेरी पूरी दिनचर्या की खबर थी। कुछ ही दिनों में उनसे भी मेरी अच्छी-खासी पटने लगी। एक दिन उन्हीं महिलाओं ने मुझे और मेरी सहेली को फिल्म दिखाने का प्रस्ताव दिया। महिलाओं ने अपनी बातों में ऐसा फंसाया कि मैं अपनी पांच महीने की बच्ची को घर पर छोड़कर उनके साथ फिल्म देखने को राजी हो गई।

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और वैसे भी महिलाओं पर किसी तरह का शक करने की मेरे पास कोई वजह नहीं थी। फिल्म के इंटरवल में हम दोनों सहेलियों को बेहोशी की दवा मिली कोल्ड ड्रिंक पिलाई गई। होश आने पर हमने खुद को भिवंडी के एक वेश्यालय में पाया। मेरी आंखों के सामने एक अजीब-सा अंधेरा छा गया, हमारा सौदा किया जा चुका था। मैंने वहां कई लोगों से आजादी की गुहार लगाई, लेकिन उसका कोई फायदा नहीं हुआ। मैंने उस नर्क से निकलने की कोशिश की, लेकिन विफल रही। बाद में मुझे मारा-पीटा गया, आंखों में मिर्च तक डाली गई।

एक साल तक ऐसे ही चलता रहा, मगर मैंने वहां से निकलने के प्रयास जारी रखे, साथ ही मैं दूसरी लड़कियों को भी बगावत के लिए उकसाती रही। वेश्यालय प्रबंधन को मेरी फितरत पता थी। दूसरी लड़कियां मेरे प्रभाव में न आएं, इसलिए उन्होंने मुझे जाने दिया। जब मैं लौटकर घर पहुंची, तो देखा कि मेरे परिवार का बुरा हाल है। मैंने जब अपनी बेटी से पूछा कि तुम्हारी मां कहां है, तो उसने कहा कि वह मर गई है। मैं भावनात्मक रूप से टूट गई और आत्महत्या के बारे में सोचने लगी, लेकिन अगले ही पल मुझे एहसास हुआ कि मेरी तरह न जाने कितनी लड़कियां है, जो वेश्यालयों में कैद हैं।

मैंने उनका जीवन बचाने का फैसला किया। मैंने पुलिस को पूरी जानकारी दी। पुलिस की शुरुआती आनाकानी के बाद मुझे स्थानीय मीडिया का साथ मिला। आखिरकार तीन मानव तस्कर पकड़े गए और उन्हें सात साल की सजा हुई। मैं यहीं संतुष्ट नहीं हुई, बल्कि एक एनजीओ और पुलिस की मदद से मैं दोबारा भिवंडी गई और वहां से तीस महिलाओं को आजाद कराया। मजदूरी करने के साथ आज मैं आंध्र प्रदेश के उन इलाकों के लोगों के बीच मानव तस्करी से बचने के लिए जागरूकता फैला रही हूं, जहां इसकी आशंका ज्यादा है।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।

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