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'मेरा मानना है कि हर कोई अपनी छोटी-छोटी आदतों से समाज में बड़ा बदलाव कर सकता है'

Fri, 29 Jun 2018 03:45 PM IST
राजेश्वरी सिंह
राजेश्वरी सिंह Updated Fri, 29 Jun 2018 03:45 PM IST
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Rajeshwari Singh walk 1000 km with the theme My Waste My Responsibility to save environment
Rajeshwari Singh
धर्म के लिए जैन साध्वियां सैकड़ों किलोमीटर पैदल चल सकती हैं, तो समाज में जागरूकता फैलाने की खातिर मैं क्यों नहीं! वैसे भी बदलाव के लिए किसी दूसरे का मुंह क्यों ताकना? गुरुवर रविंद्रनाथ ठाकुर ने भी तो एकला चलो रे का नारा दिया था। वड़ोदरा से दिल्ली तक पद यात्रा पूरी करने से पहले मेरे जेहन में यही ख्याल आए थे।
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मैं वड़ोदरा में रहने वाली बत्तीस वर्षीया एक सामाजिक कार्यकर्ता हूं। मैं हमेशा से समाज हित में अनेक रचनात्मक कार्यों में आगे रहती हूं। गरीब बच्चों के लिए मैं एक एनजीओ चलाती हूं। प्लास्टिक का बढ़ता उपयोग लंबे वक्त से मुझे परेशान कर रहा है।
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प्लास्टिक का उपयोग रोकने और पर्यावरण के प्रति लोगों की जिम्मेदारी का एहसास कराने के लिए मैंने पिछले दिनों एक रचनात्मक मुहिम चलाने की ठानी। मैंने तय किया कि मैं पैंतालीस दिनों में वड़ोदरा से दिल्ली तक पद यात्रा पूरी करूंगी और रास्ते में लोगों को पर्यावरण के प्रति जागरूक करूंगी।
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मेरी लड़ाई प्लास्टिक के विरुद्ध थी, इसलिए जरूरी था कि मैं खुद ऐसे उदारहण प्रस्तुत करती, जिससे लोगों पर मेरी बातों का प्रभाव पड़े। अपनी पद यात्रा के लिए मैंने तय किया कि मैं किसी भी ऐसी वस्तु को अपने साथ नहीं रखूंगी, जो प्लास्टिक से बनी हो।

पानी की बोतल तक नहीं। पूरे डेढ़ महीने तक मैंने मटके में पानी रखने वालों की मदद से अपनी प्यास बुझाई। इस दौरान मुझे एक और खास अनुभव हुआ। यदि मैं सील बंद बोतल वाला पानी खरीदकर पीती, तो मैं अपने देश के विभिन्न इलाकों में अलग-अलग स्वाद वाले पानी से कभी परिचित नहीं हो पाती।

मेरा रास्ता राजस्थान के गर्म इलाकों से गुजरता था, इसलिए मैं हर सुबह साढ़े चार बजे उठकर पैदल चलती। दोपहर में आराम करती, फिर शाम को चलती। इस तरह हर दिन तीस से पैंतीस किलोमीटर का सफर तय करती। इसी वर्ष विश्व पृथ्वी दिवस से शुरू हुई मेरी यात्रा विश्व पर्यावरण दिवस पर समाप्त हुई।

इस दौरान मैंने गुजरात, राजस्थान और हरियाणा राज्यों में एक हजार से भी ज्यादा किलोमीटर की यात्रा पैदल पूरी की। इस दौरान रास्ते में पड़ने वाले गांव और कस्बों के लोगों से मिलकर मैंने उनसे प्लास्टिक के उपयोग को कम या हो सके तो खत्म करने की गुजारिश की। ठहरने के लिए मैंने ज्यादातर सरकारी विश्राम स्थलों का उपयोग किया।

जो लोग मेरी बातों से इत्तेफाक रखते, कई बार वे कुछ दूरी तक मेरा साथ देते। लेकिन ऐसा हमेशा नहीं होता। मैंने लंबे-लंबे रास्ते अकेले नापे हैं। मेरी यात्रा हमेशा मेरी योजनाओं के मुताबिक नहीं रही। कई बार मुझे तमाम तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ा। अनेक अवसर आए, जब मोटरसाइकिल सवारों ने मेरा पीछा किया, मुझे छेड़ा।

मैंने हिम्मत से ऐसी परिस्थितियों का सामना किया, क्योंकि मैं इन सभी चीजों के लिए तैयार थी। कुछ ऐसी घटनाएं भी घटीं, जिसके लिए मैं तैयार नहीं थीं, जैसे एक जगह एक कुत्ता मेरा जूता मुंह में दबाकर भाग गया। काफी भाग दौड़ करने के बाद मुझे मेरा जूता वापस मिला। नंगे पांव यात्रा कर पाना मेरे लिए और मुश्किल भरा होता।

हालांकि अब कई शहरों/राज्यों में प्लास्टिक के प्रयोग पर प्रतिबंध लगाने की पहल हो रही है। अनेक लोग जागरूक भी हो रहे हैं और वे अपनी दिनचर्या में बदलाव भी कर रहे हैं। मगर यह पर्याप्त नहीं है, यह तो बस शुरुआत भर है। मैं मानती हूं कि हर कोई अपनी छोटी-छोटी आदतों से समाज में बड़ा बदलाव कर सकते हैं।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।
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